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कबिलाई एक 'प्रेम—कथा'... भाग—5

      आज बरसों बाद मौसम ने घना काला चौला ओढ़े हुए अपनी बाहों में बारिश को भर लिया था जैसे....हर गर्ज़ना पर उसकी आह सुनाई दे रही मानो...। शंकरी ने तंबू से बाहर झांककर देखा तो शाह अंधेरा मंडराया हुआ था...और तभी बादल फट पड़े और तेज बारिश होने लगी।   शंकरी कांप उठी और भीतर आकर अपने बिछौने में सिमटकर बैठ गई। उसका दिल जोरों से धड़कनें लगा...आंखों में बीती यादें तैर उठी...बारिश की धार ने उसके दिल को छलनी कर दिया...वह समझ गई...इस बारिश का वेग भी उतना ही तीव्र है जितना कि उस रात में था।        एक बार फिर शंकरी के ख़याल में वो रात जाग उठी...उस तूफानी रात के आग़ोश में सोहन की यादें करवटें लेने लगी।  और उसे ये महसूस होने लगा मानों सोहन यहीं कहीं हैं...उसके आसपास...।  मगर अपने अहसासों को किससे बांटे... अपनी तड़प को किससे बयां करें...। यहां कौन हैं जो उसके भीतर की आग को महसूस कर सके...। ये बारिश की बूंदें ही हैं जो उसकी तपन को कुछ ठंडक दे रही हैं...वह कभी अपने तंबू से बाहर जाती और ख़ुद को इन बूंदों से भीगो आती...और फिर उन्हीं बूंदों को अपने आंचल से पोंछ लेती। लेकिन बूंदों के होने का अहसास उसके चेहरे

'विश्व हृदय दिवस'

अकसर हम सुनते हैं और कहते भी हैं कि, आज मेरे सीने में दर्द हो रहा हैं...या आज सुबह से ही मेरे बाएं हाथ में अजीब सा दर्द या झंझनाहट महसूस हो रही हैं...।  सिद्धी शर्मा  फिर भी हम सिर्फ देसी उपचार या घर पर रखी दर्द निवारक दवा लेकर रह जाते हैं...। मगर अब नहीं, अब ज़रा थोड़ा और अधिक 'हेल्थ कांशस' यानि स्वास्थ्य के प्रति जागरुक और सतर्क हो जाइए...और दिल संबंधी बीमारी की सही जानकारी भी रखें।         'कोरोना काल' ऐसे कई लोगों की कहानियां भी अपने पीछे छोड़ गया हैं जो कई गंभीर बीमारियों से ग्रसित थे  जिनमें हृदय संबंधी बीमारी भी शामिल हैं। कुछ लोग अपनी जागरुकता और समय—समय पर मेडिकल सलाह लेकर अपने हार्ट की देखभाल कर रहे हैं...लेकिन ​कुछ लोग अब भी लापरवाह बनें हुए हैं।       ख़ुद डॉक्टर्स और मेडिकल साइंस ने भी इस बात को स्वीकारा है कि हृदय संबंधी बीमारी वालों को कोरोना संक्रमित होने का ख़तरा हैं। ऐसे में 'कहानी का कोना' ब्लॉग आज आपको अपने हृदय की देखभाल करने की अपील करता हैं।     आज चूंकि 'विश्व हृदय दिवस' हैं, इसीलिए ख़ुद का ख़याल रखने का संकल्प लें और समय—समय पर अ

'कांपती' बेबसी..भाग—2

          'ऐ मेरी बीनू उठ ना...।' लेकिन बीनू कोई जवाब न देती...। देखते ही देखते बीनू के आसपास भीड़ ज़मा हो गई। तभी वहां मौजूद लोगों में किसी ने कहा, 'अरे, इसे फोरन अस्पताल ले जाओ...'तो कोई कहता 'अरे, कोई इसे पानी तो पिलाओ...।'         बीनू को ऐसे देख कमला का जी गले तक भर आया। आंखों में आंसू लिए वह चारों तरफ लोगों को देखती और फिर अपनी बच्ची को छाती से लगाए फूट—फूटकर रोती। कभी उसके माथे को चूमती तो कभी जोर—जोर से चीखती ...। लेकिन बीनू कोई हरकत नहीं करती...।         तभी कमला के गांव का ही गुब्बारे बेचने वाला उसकी मदद के लिए दौड़ा...उसने अपने रिक्शे में कमला, बीनू और उसकी छोटी बेटी को बैठाया और उन्हें लेकर सीधे नजदीकी अस्पताल पहुंचा।      पीछे से कमला के खिलौने की रखवाली का ज़िम्मा गुब्बारे बेचने वाले की पत्नी ने संभाला।        अस्पताल पहुंचने पर डॉक्टर ने बीनू का चेकअप किया, और बताया कि बीनू के सिर में नीचे गिरने से गहरी चोट लगी है, जिससे उसके सिर की नस फट गई है...। अब वह कभी नहीं उठेगी...।       ये सुनते ही कमला फफक—फफक कर रोनी लगी। इसी एक क्षण में उसकी पूरी दुनिय

'कांपती' बेबसी...

     सूजी हुई आंखें...कपकपाते हाथ...और छाती में धड़क रहा बेबस कलेजा... , बैठा हैं सड़क पर उन खिलौनों के बीच जो मासूम कांधे पर सवार होकर आज मेले में बिकने को आए थे...। लेकिन जो हाथ इन्हें बेच रहे हैं उनमें अब वो जान नहीं बची जो महज़ कुछ घंटों पहले तक थी। इन हाथों में मजबूर हालातों की उस ' अर्थी का बोझ ' ही शेष रह गया हैं जो सिर्फ सहारा बनकर मेले में आई थी...।           यूं तो कमला अपने पति ' लच्छू ' के संग हर बरस मेले में खिलौने बेचने जाती हैं। अबके जरा लच्छू ने बिस्तर क्या पकड़ा मेले में जाने को लेकर कमला बेहद चिंतित हो उठी हैं। चैत्र माह की सप्तमी को पाली के सोजत में जमकर मेला भरता हैं। इस मेले से कमला भी हर बार अच्छी खासी कमाई करके लौटती हैं...। हर साल लाखों लोग दूर दराज़ के कोनों से ये मेला देखने आते हैं...। यूं तो मेला आठ दिन तक भरता है लेकिन सप्तमी को ये परवान पर होता हैं।  ' थड़ी — ठेले ', ' खोमचे ' ( अस्थायी काम वाले) , फेरी वाले और सड़क पर बैठकर माल बेचने वाले फुटकर व्यवसायियों के लिए यह ' उम्मीदों वाला मेला ' हैं। इसी उम्मीद के साथ