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'मीत'....

पढ़िए लेखिका 'वैदेही वाटिका' द्वारा लिखित कहानी 'मीत'...। मुझे  गाने सुनते हुए काम करने की आदत हैं। आज भी जब मैं अपने कमरें की सफ़ाई कर रहीं थीं तब आदतन मैंने रेडियो ऑन कर लिया था।  उम्र का दौर था या इश्क़ का जोर तय करना मुश्किल था पर जब भी बालासुब्रमण्यम की आवाज़ में कोई गीत सुनती थीं तो दिल करता उनके गाये गीतों को सुनकर उम्र गुज़ार दूँ । “तेरे मेरे बीच में कैसा है ये बंधन अनजाना… मैंने नहीं जाना… तूने नहीं जाना…”  आज गीत औऱ गायक की मखमली आवाज़ जिसकी मैं दीवानी थीं, चुभ रहे थे किसी शूल की तरह। आज जब विविध भारती ट्यून किया औऱ उस पर यह गीत बजने लगा तो अचानक किसी का चेहरा ज़हन में आ गया। मुझे लगा जैसे मेरी रगों में बहता सारा खून सुख गया। बिन पानी के जैसे मछली तड़पती हैं ठीक वैसे ही मेरा मन तड़प उठा। मैंने तुंरत रेडियो बंद कर दिया। कमरें में बिखरे सामान के बीचो-बीच मैं धम्म से बैठ गई। कमरें के सामान से ज़्यादा बिखरा हुआ मेरा मन था , जिसे समेटने की, समझाने की मैंने बहुत कोशिश की। अंदर से उठ रहीं हुक, पीड़ा औऱ सवालों की ज्वाला को शांत करने का कोई भी उपाय मेरे पास नहीं था। आँखों से आ

रानी लक्ष्मीबाई जयंती----

'खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी बुंदेलों हर बोलो के  मुंह हमने सुनी कहानी थी...।       याद होगी आपको ये पंक्तियां...। जिसे कवयित्री 'सुभद्रा कुमारी चौहान' ने लिखा था। जिस वक़्त जिस दिन और जिस प्रहर में ये पंक्तियां लिखी जा रही होगी तब किसने सोचा था कि ये पंक्तियां आज़ादी के इतने सालों बाद भी यूं नसों में दौड़ेगी और खून में उबाल लाएगी...। लेकिन ये सच ही हैं जब भी इन पंक्तियों को पढ़ा या सुना जाता हैं तब उस बहादुर लड़की की तस्वीरें सामने आने लगती हैं जिसने अपने देश की ख़ातिर ख़ुद को मिटा दिया लेकिन देश का सिर झुकने  नहीं  दिया।        ये पंक्तियां उस पूरी कहानी को शुरुआत से अंत तक बयां करती  हैं  जब हम ख़ुद को उसी समय में पाते हैं.....ऐसा लगता हैं मानों हम उसी क्रांति में शामिल हैं जब एक हाथ में तलवार थामें  हुए  और दूसरे हाथ से अपनी पीठ पर अपने बेटे को संभाले हुए ये बहादुर वीरांगना अपने देश के  दुश्मनों से युद्ध लड़ रही हो।        ज़रा ठहर कर सोचिए...क्या  वाकई   ये इतना आसान  रहा होगा . ..? जिसे सोचने भर से हम कांप जाते हैं उसे झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने कर दिखा

यूं तेरा 'लौटना'...

 यूं  तेरा 'लौटना' बेशक एक नई शुरुआत है जिसमें ख़ुद से ख़ुद की मुलाकात है। तेरा 'लौटना' बेशक आत्मा का एक 'सुकून' है,....।      उस भोली सुबह की पहली किरण भी है। तेरा 'लौटना' उस पहली  'छुअन'  की याद दिलाना  और साथ गुज़ारें पलों का अहसास भी है...।   निश्चत ही तेरा 'लौटना' मेरा 'वजूद' भी है और मेरे होने का 'सबूत' भी...।  मगर....! मगर....! सिद्धी शर्मा  तेरा लौटना उस 'अंत' के बाद की शुरूआत है, जो न 'लौटने' के लिए हुआ था कभी....।  तेरा लौटना उस 'अंत' के बाद की शुरूआत है, जो न 'लौटने' के लिए हुआ था कभी....।  दिल तेरे यूं लौट आने पर कैसे खोले वो दरवाज़े   जिसे ख़ुद तूने ही बंद किए थे कभी....। बेशक तेरा यूं 'लौट आना' एक नई शुरुआत है एक नई शुरुआत हैं...'मगर'...!  अब न वो 'हालात' हैं और न वो 'बात' है...।   बेशक तेरा यूं 'लौट आना' एक नई शुरुआत है ...... टीना शर्मा 'माधवी'

'पारंपरिक खेल' क्यों नहीं...?

'बाल दिवस' पर विशेष——— ये कहानी हैं एक ऐसे बचपन की जिसमें धूल और मिट्टी से सने हाथ और पैर हैं...। ये कहानी हैं एक ऐसे अल्हड़पन की जो बेफिक्र था 'कॉम्पीटीशन' की चकाचौंध वाले गैजेट्स से...। ये कहानी हैं एक ऐसे बचपन की जहां दोस्ती की छांव में ऊँच-नीच का भेद न था...ये कहानी है एक ऐसे बचपन की जब पीट पर थप्पी मारते ही दौड़ शुरु हो जाया करती थी...ये कहानी हैं एक ऐसे बचपनें की जहां 'खेल' सिर्फ खेलने भर के लिए ही खेले जाते थे, जिसमें अपनापन भी था और ज़मीन से जुड़ाव भी।  सिद्धी शर्मा  कहां गुम हो गए हैं वो कंचें और चीयों की खन—खन...वो पत्थर का गोल सितोलिया...और वो लंगड़ी पव्वा...।    वो कपड़ें की गेंद का पीट पर मारना तो हाथ पकड़कर वो फूंदी लेना...। वो 'ता' बोलकर कहीं छुप जाना, फिर पीछे से आकर 'होओ' कहकर डरा देना...।      कहीं बहुत पीछे छूट गया हैं 'शायद' वो बचपन....और छूट गई है वो 'चिल्ला पौ'...। कहीं पीछे छूट गए हैं वो परंपरा से बंधें खेल...जो आज के 'बचपनें' से कोसो दूर हो चले हैं...। मलाल है इस बात पर कि, वर्तमान पीढ़ी में ये खेल

कबिलाई एक 'प्रेम—कथा'...भाग—8

...'मेरे बेटे की जान तो ले ली तुमने अब इसकी लाश पर से मेरा हक मत छीनो...। इसे लेकर मुझे जाने दो'...। सरदार ने फोरन अपने भाई को सोहन की गाड़ी की ओर दौड़ने और उसमें पड़े सच को खोज लाने को कहा...।    भीखू सरदार का भाई बिना देरी किए गाड़ी की ओर दौड़ पड़ा...। उसने गाड़ी में तलाश शुरु की तब उसे एक 'डायरी' मिली, जिसके पहले पृष्ठ पर लिखा था 'शंकरी'...।    ये पढ़कर सरदार का भाई कुछ चौंका फिर बिना रुके हुए वो डायरी लेकर सीधे भीखू सरदार के पास पहुंचा और उसके हाथ में डायरी देते हुए बोला, शायद सोहन की 'मां' इसी सच के बारे में बोल रही हैं...।      सरदार ने डायरी खोली और पहला पृष्ठ देख वो भी चौंका जिस पर 'शंकरी' लिखा था। उसने सोहन की मां से पूछा क्या ये है सच...? मां ने गर्दन हिलाई और फुट—फुटकर रोने लगी...।      सरदार ने अपने भाई को डायरी दी और उसे पढ़ने को कहा। टिबड्डे पर मौजूद सभी कबिलाई डायरी में क्या लिखा हुआ है ये जानना चाहते थे...। पूरा माहौल शांत हो गया...जो जहां था वहीं बैठ गया...।     सरदार के भाई ने डायरी पढ़ना शुरु की।  'आज भयानक तूफानी रात है...

कबिलाई एक 'प्रेम—कथा'...भाग—7

.......लेकिन कबिलाईयों ने उसे अपने बेटे सोहन के पास नहीं जाने दिया...ये देखकर शंकरी चिल्ला उठी...बस करो....। सारे के सारे एक निहत्थे पर टूट पड़े...बूढ़ी मां ने तुम सबका क्या बिगाड़ा हैं...इस पर तो तरस खाओ...। शंकरी की बात सुनकर भीखू सरदार का भाई उसके बाल पकड़कर उसे घसीटता हुआ सोहन के पास लाया और उसी के सामने सोहन को लात—घुसों से मारने लगा...। शंकरी ने पूरी ताकत से उसे धक्का मारा और सोहन को बचाने के लिए उसके आगे आ गई। उसने सोहन को कसकर पकड़ लिया। पूरे नौ बरस बाद दोनों एक—दूसरे के इतने क़रीब थे।     सोहन ने नौ बरस पहले शंकरी को ऐसे ही गले से लगाया था...उसका वो स्पर्श आज फिर से जीवंत हो उठा ...। उसने भी शंकरी को अपनी बाहों में भर लिया...। दोनों के दिल जोरों से धड़कनें लगे...दोनों एक—दूजे के लिए तड़प उठे...।            ये देख भीखू सरदार बोला— अरे! इसे सोहन से दूर करो...। आज कबिले का हर आदमी अपनी आंखों से देखेगा...बस्ती के रीति—रिवाज़ों को तोड़ने का अंजाम क्या होता हैं...। शंकरी को भी इसके किये की सज़ा अवश्य ही मिलेगी...लेकिन उससे पहले इस शहरी बाबू को हमारे मान—सम्मान को ठेस पहुंचाने की सज़

कबिलाई एक 'प्रेम—कथा'...भाग— 6

कबिलाई एक जीप को घेरेे खड़े हैं...और हवा में खंजर...चाकू...दांती..कुदाली लहरा रहे हैं...। भीखू सरदार और उसका भाई नौ बरस से जिस दिन के इंतज़ार में थे वो इस वक़्त उनकी आंखों के सामने था...।  जिस सोहन को वे हर जगह ढूंढ रहे थे, वो आज उनके सामने खड़ा था...। दोनों के लिए इस पर यक़ीन कर पाना मुश्किल था लेकिन ये सच था...। दोनों ने एक—दूसरे की ओर देखा और तेजी से भीड़ की ओर बढ़े। जीप के पास सोहन हाथ जोड़े हुए खड़ा था और उसके माथे से पसीना टपक रहा था। जीप के भीतर उसकी बूढ़ी मां बैठी हुई थी...जो बुरी तरह से कांप रही थी...।  तभी भीखू सरदार चिल्ला उठा...क्या हो रहा हैं ये सब...। अपने सरदार को देख सभी कबिलाई खुशी से झूम उठे और चारों तरफ 'हो हुक्का...हो हुक्का...हो हुक्का'...का शोर गूंज उठा।  सरदार ने हाथ हिलाते हुए सभी को शांत होने को कहा...। तभी पास ही खड़ा भीखू सरदार का भाई मूंछों पर ताव देते हुए बोला...'ओ..हो...सोहन बाबू...! बरसो बाद...मिलें हो...कहो— कैसे हो'...।  तभी कबिलाई बोल उठे, अरे! ये क्या बताएगा अब...। अब तो हम बताएंगे इसे...। तभी सरदार फिर चिल्ला उठा...शांत हो जाओ सभी...इ

कबिलाई एक 'प्रेम—कथा'... भाग—5

      आज बरसों बाद मौसम ने घना काला चौला ओढ़े हुए अपनी बाहों में बारिश को भर लिया था जैसे....हर गर्ज़ना पर उसकी आह सुनाई दे रही मानो...। शंकरी ने तंबू से बाहर झांककर देखा तो शाह अंधेरा मंडराया हुआ था...और तभी बादल फट पड़े और तेज बारिश होने लगी।   शंकरी कांप उठी और भीतर आकर अपने बिछौने में सिमटकर बैठ गई। उसका दिल जोरों से धड़कनें लगा...आंखों में बीती यादें तैर उठी...बारिश की धार ने उसके दिल को छलनी कर दिया...वह समझ गई...इस बारिश का वेग भी उतना ही तीव्र है जितना कि उस रात में था।        एक बार फिर शंकरी के ख़याल में वो रात जाग उठी...उस तूफानी रात के आग़ोश में सोहन की यादें करवटें लेने लगी।  और उसे ये महसूस होने लगा मानों सोहन यहीं कहीं हैं...उसके आसपास...।  मगर अपने अहसासों को किससे बांटे... अपनी तड़प को किससे बयां करें...। यहां कौन हैं जो उसके भीतर की आग को महसूस कर सके...। ये बारिश की बूंदें ही हैं जो उसकी तपन को कुछ ठंडक दे रही हैं...वह कभी अपने तंबू से बाहर जाती और ख़ुद को इन बूंदों से भीगो आती...और फिर उन्हीं बूंदों को अपने आंचल से पोंछ लेती। लेकिन बूंदों के होने का अहसास उसके चेहरे

'विश्व हृदय दिवस'

अकसर हम सुनते हैं और कहते भी हैं कि, आज मेरे सीने में दर्द हो रहा हैं...या आज सुबह से ही मेरे बाएं हाथ में अजीब सा दर्द या झंझनाहट महसूस हो रही हैं...।  सिद्धी शर्मा  फिर भी हम सिर्फ देसी उपचार या घर पर रखी दर्द निवारक दवा लेकर रह जाते हैं...। मगर अब नहीं, अब ज़रा थोड़ा और अधिक 'हेल्थ कांशस' यानि स्वास्थ्य के प्रति जागरुक और सतर्क हो जाइए...और दिल संबंधी बीमारी की सही जानकारी भी रखें।         'कोरोना काल' ऐसे कई लोगों की कहानियां भी अपने पीछे छोड़ गया हैं जो कई गंभीर बीमारियों से ग्रसित थे  जिनमें हृदय संबंधी बीमारी भी शामिल हैं। कुछ लोग अपनी जागरुकता और समय—समय पर मेडिकल सलाह लेकर अपने हार्ट की देखभाल कर रहे हैं...लेकिन ​कुछ लोग अब भी लापरवाह बनें हुए हैं।       ख़ुद डॉक्टर्स और मेडिकल साइंस ने भी इस बात को स्वीकारा है कि हृदय संबंधी बीमारी वालों को कोरोना संक्रमित होने का ख़तरा हैं। ऐसे में 'कहानी का कोना' ब्लॉग आज आपको अपने हृदय की देखभाल करने की अपील करता हैं।     आज चूंकि 'विश्व हृदय दिवस' हैं, इसीलिए ख़ुद का ख़याल रखने का संकल्प लें और समय—समय पर अ

'कांपती' बेबसी..भाग—2

          'ऐ मेरी बीनू उठ ना...।' लेकिन बीनू कोई जवाब न देती...। देखते ही देखते बीनू के आसपास भीड़ ज़मा हो गई। तभी वहां मौजूद लोगों में किसी ने कहा, 'अरे, इसे फोरन अस्पताल ले जाओ...'तो कोई कहता 'अरे, कोई इसे पानी तो पिलाओ...।'         बीनू को ऐसे देख कमला का जी गले तक भर आया। आंखों में आंसू लिए वह चारों तरफ लोगों को देखती और फिर अपनी बच्ची को छाती से लगाए फूट—फूटकर रोती। कभी उसके माथे को चूमती तो कभी जोर—जोर से चीखती ...। लेकिन बीनू कोई हरकत नहीं करती...।         तभी कमला के गांव का ही गुब्बारे बेचने वाला उसकी मदद के लिए दौड़ा...उसने अपने रिक्शे में कमला, बीनू और उसकी छोटी बेटी को बैठाया और उन्हें लेकर सीधे नजदीकी अस्पताल पहुंचा।      पीछे से कमला के खिलौने की रखवाली का ज़िम्मा गुब्बारे बेचने वाले की पत्नी ने संभाला।        अस्पताल पहुंचने पर डॉक्टर ने बीनू का चेकअप किया, और बताया कि बीनू के सिर में नीचे गिरने से गहरी चोट लगी है, जिससे उसके सिर की नस फट गई है...। अब वह कभी नहीं उठेगी...।       ये सुनते ही कमला फफक—फफक कर रोनी लगी। इसी एक क्षण में उसकी पूरी दुनिय

'कांपती' बेबसी...

     सूजी हुई आंखें...कपकपाते हाथ...और छाती में धड़क रहा बेबस कलेजा... , बैठा हैं सड़क पर उन खिलौनों के बीच जो मासूम कांधे पर सवार होकर आज मेले में बिकने को आए थे...। लेकिन जो हाथ इन्हें बेच रहे हैं उनमें अब वो जान नहीं बची जो महज़ कुछ घंटों पहले तक थी। इन हाथों में मजबूर हालातों की उस ' अर्थी का बोझ ' ही शेष रह गया हैं जो सिर्फ सहारा बनकर मेले में आई थी...।           यूं तो कमला अपने पति ' लच्छू ' के संग हर बरस मेले में खिलौने बेचने जाती हैं। अबके जरा लच्छू ने बिस्तर क्या पकड़ा मेले में जाने को लेकर कमला बेहद चिंतित हो उठी हैं। चैत्र माह की सप्तमी को पाली के सोजत में जमकर मेला भरता हैं। इस मेले से कमला भी हर बार अच्छी खासी कमाई करके लौटती हैं...। हर साल लाखों लोग दूर दराज़ के कोनों से ये मेला देखने आते हैं...। यूं तो मेला आठ दिन तक भरता है लेकिन सप्तमी को ये परवान पर होता हैं।  ' थड़ी — ठेले ', ' खोमचे ' ( अस्थायी काम वाले) , फेरी वाले और सड़क पर बैठकर माल बेचने वाले फुटकर व्यवसायियों के लिए यह ' उम्मीदों वाला मेला ' हैं। इसी उम्मीद के साथ