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Showing posts from January, 2020

दीदी, ये गणतंत्र दिवस क्या है?

           हैरान हूं मैं आज। आज तो 'रिपब्लिक डे' है। क्या होता है गणतंत्र दिवस?  ये सवाल हैं किसी का मुझसे... पड़ौस में आयोजित गणतंत्र दिवस समारोह में सभी इकट्ठा हुए। जब मैंने सभी को गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं दी तभी एक बच्चे ने बेहद ही मासूमियत से मुझसे सवाल किया, दीदी आज तो 'रिपब्लिक डे' हैं ये गणतंत्र दिवस क्या होता है?                     ये सुनकर मैं हैरान रह गई। उसका सवाल तो मासूम था लेकिन उसके मायने बेहद गहरा अर्थ लिए हुए थे।      गणतंत्र दिवस अब रिपब्लिक डे हो गया है। ये सिर्फ एक 'भाषा' अंतर था या 'संवादहीनता'।                          बच्चे के इस सवाल ने मुझे मेरा बचपन या​द दिला दिया। जब एक माह पहले ही हम गणतंत्र दिवस की तैयारी में जुट जाते थे। इस दौरान स्कूल में होने वाली निबंध प्रतियोगिता, देशभक्ति से ओत—प्रोत रंगारंग सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के जरिए ही गणतंत्र लागू होने, संविधान के निर्माण और वीर—शहीदों के बलिदान की ढेरों कहानियां सुन लेते। और गणतंत्र क्यूं मनाया जाता है, सही अर्थ में इसके मायने समझ लेते।                      खैर, अ

मिसेज 'लिलि'

         दुनिया में भी अजीबों गरीब लोग होते हैं। कभी वो हमसे तो कभी हम उनसे बिल्कुल भी मेल नहीं   खाते। या यूं कहें कि विचारों में भिन्नता होती है। लेकिन जब  'यूनिवर्सल   बिहेवियर' की बात की जाती है तो एक सामान्य सोच, विचार और व्यवहार की दरकार हर इंसान में अपेक्षित है।         जैसे कोई आपसे नमस्कार करें तो उसका जवाब आप नमस्ते ही देंगे। कोई आपसे पूछे कि आप कैसे है? तो आप उसे यही कहेंगे कि मैं बढ़िया हूं। लेकिन कुछ लोग इस सामान्य व्यवहार से इतर होते हैं। ये लोग ख़ुद को सबसे बेहतर और अलग मानते है। वे सिर्फ अपने आपको देखते है, अपने आसपास वाले तो जैसे उन्हें नजर ही नहीं आते है।         इनके इसी व्यवहार के कारण लोग इनसे 'कट' ले लेते है यानि कि एक दूरी सी बना लेते है।     एक व्यक्ति का उसके व्यवहार के कारण समाज से 'बॉयकॉट' हो जाना एक बेहतर और प्रगतिशील समाज के लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं है। तभी तो बरसों पहले दार्शनिक अरस्तू ने कहा था कि..' मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है'...।    ये एक गहरा विचार है। जिसकी समझ उन कुछेक लोगों में नहीं है जो रहते तो इसी समाज में है

तुलसी की पत्ती

  ह मेशा याद रहेगा वो एक कप चाय का प्याला , बहुत स्पेशल जो था। होता भी क्यूं ना ? किसी के प्यार की मिठास जो थी इसमें।           जिंदगी की भागमभाग में न जाने कहां खो गई वो चाय की चुस्की। जो हर सुबह अन्नपूर्णा देवी के नाम के बाद ही गले में उतारी जाती थी। यह स्वाद अब मेरी जीभ को फिर कभी नसीब नहीं होगा। यह भी चला गया उसी के साथ। मलाल तो इस बात का रहेगा , एक आखिरी बार उसके गांव जाकर वही पुरानी यादें नहीं जी सकी। जो इसी एक कप चाय के प्याले के साथ में शुरु हुआ करती थी।      ‘ ऐ टिनकी दिन चढ गया , दादो बा ने चाय रख दी हैं--- काश मुझे फिर से इसी प्यारी आवाज से वो नींद से जगा दें , और प्यार से मुझे एक कप चाय की प्याली देकर कहे , पहले अन्नपूर्णा को पिलाओ। लेकिन अब ऐसा तो दुबारा नहीं होगा।           आज जब मेरे हाथ में वासु ने चाय का प्याला दिया तो उसकी महक ने मुझे वो दिन याद दिला दिया , स्वाद भी लगभग वहीं , तो भला वो पल क्यों ना याद आता ?  मुझे लगता है शायद तुम्हें चाय पसंद नहीं आई..... ? वासु ने मुझसे यह सवाल करके मुझे पुरानी यादों से जगाया। नहीं ....नहीं... , मैंने इस तरह उन्हें अ