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Showing posts from April, 2020

लॉकडाउन: 'मैं मरकर भी नहीं मर सका'...

       अदायगी का मंच आज फिर मौन हो गया...जब उसने एक दमदार और सशक्त अभिनेता को खो दिया...। कल इरफान के सदमे से अभी देश उभरा भी नहीं था कि आज सुबह फिर एक और सदमा मिला कि...ऋषि कपूर नहीं रहे....।           कला जगत में अपनी अलग पहचान बनाने वाले इस उम्दा कलाकार को भूल पाना वाकई संभव नहीं होगा। ऋषि कपूर जिन्हें 'चिंटू' निकनेम से भी पुकारा जाता था..अब सिर्फ उनकी यादें ही शेष रह गई है।        आज मुझे 2017 का वो दिन याद आता है जब जयपुर लिटरेचर ​फेस्टिवल में इनकी कवरेज के लिए गई थी। ऋषि जी ने यहां पर अपनी आत्मकथा 'खुल्लम—खुल्ला' की बुक लांच की थी। इस दौरान उन्होंने अपनी ज़िंदगी से जुड़े कई किस्से साझा किए थे। जिसे सुनकर दर्शक झूम रहे थे। जब उन्होंने फिल्म 'सागर' का जिक्र करते हुए कहा कि' मैं शायर तो नहीं...तो वाकई दर्शक दीर्घा में बैठे हर शख़्स के चेहरे खिल उठे थे...। मेरे लिए इसलिए ये सुखद अनुभव रहा कि मैंने उन्हें रुबरु देखा था। लेकिन आज वे अपने प्रशंसकों के चेहरे पर अपने ना होने की उदासी छोड़ गए है।               ये उन कलाकारों में शामिल थे जिन पर अपने ख़ानदान

लॉकडाउन में 'इरफान' का यूं चले जाना....

           मेरे कुछ शब्द आज उस कलाकार को समर्पित हैं जिसने अपनी अदायगी से सिनेमा जगत में अमिट छाप छोड़ी हैं। इनके जाने से वाकई सिनेमा जगत में एक सूनापन ही शेष रह गया है। मेरे पास आज वो शब्द नहीं जिनसे मैं इस दु:खद पल को भर सकूं..।       कुछ शब्द शेष है जो इस महान कलाकार को हमेशा अपनी अदायगी के रुप में जिंदा रखेंगे...।          इरफान खान मेरे पसंदीदा कलाकारों में शामिल थे...लेकिन आज जब उनके निधन की ख़बर सुनी तो दिल धक से रह गया। दिल मानने को तैयार न था लेकिन सच को स्वीकारना ही था...।          ये वो कलाकार थे जो अपने किरदार को जीते थे, यहीं वजह है कि इनकी हर फिल्म का किरदार अलग—अलग रुप में नज़र आता। लेकिन हर किरदार में कुछ नयापन होता, जो हमेशा निखर कर आता। ऐसे उम्दा और दमदार किरदार को भूल पाना संभव नहीं होगा...।          जब भी उम्दा और बेहतरीन अदायगी की बात होगी..ये 'पान सिंह तोमर' और 'मकबूल' हमेशा याद आएगा..। इरफान में सीखने की जो ललक थी वो ही उनकी फिल्मों में साफ दिखती थी। जो हर किसी के लिए एक प्रेरणा है। ..वरना यूं ही लंच बॉक्स का 'साजन' और हासिल का '

लॉकडाउन और 'शेक्सपियर'

        जब देश में 21 दिन का लॉकडाउन लगा था तभी से मन में था कि इस दौरान मैं वो सारी किताबें पढूंगी जिसे मैंने पीएलएफ—2020 यानि कि समानांतर साहित्य उत्सव के आयोजन के समय खरीदा था। जब मैंने अपनी किताबों में से किसी एक किताब को चुनना चाहा तब मैंने विलियम शेक्सपियर की 21 अनमोल कहानियों को चुना।        जब इस किताब को खरीदा था तब ये नहीं सोचा था कि इसे पढ़ने का भी ऐतिहासिक समय होगा और अंक भी समान होंगे। यानि कि ''21 दिन का लॉकडाउन और शेक्सपियर की 21 अनमोल कहानियां''..। ये किताब इसी शीर्षक से प्रकाशित है।            ये बात अलग है कि मैंने आज शेक्यपियर की आखिरी कहानी 'भूल चूक माफ' यानि कि 21 वीं कहानी को ख़त्म किया है। ये कहानी जुड़वां बच्चों और बिछड़े माता—पिता की कहानी ​है। जिसमें अपनों से बिछड़ने का दर्द हैं और फिर सालों बाद एक विदेशी धरती पर सभी के मिल जाने का सुखद अहसास है। यानि कि हैप्पी एंडिंग..।           आज  इत्तेफ़ाक  ही है जब मैंने ये प्रसंग लिखा है तब यानि आज 26 अप्रेल है और इसी दिन शेक्सपियर का जन्म दिवस भी है। इसीलिए मेरा लेखन आज प्रासंगिक हो गया

लॉकडाउन में धड़कता 'खाकी' का दिल

       ये कैसा वक़्त है आज एक मां के लिए... जब वो अपनी ही मासूम बेटी को अपने से दूर रहने को कह रही है...वो मासूम बच्ची बार—बार उसकी तरफ दौड़ रही है लेकिन मां है कि अपनी ममता के आंचल में उसे लेने की बजाय उसे अपने से दूर किए हुए है। बच्ची की आंखों से आंसू बह रहे है, वह जोर—जोर से गला फाड़कर मम्मी..मम्मी पुकार रही  है.. लेकिन मां है कि उसे गोद में नहीं ले रही...।          ऐसी क्या मजबूरी आन पड़ी इस मां के सामने, जो अपनी आंखों में समुद्र से गहरे आंसू लिए बस दूर ही से अपने कलेजे के टुकड़े को यूं ही बिलखता हुआ देख रही है...। क्यूं मां और बच्चे का ये भावनात्मक रिश्ता आज मौन है...।         जबकि पिछले पांच सालों में एक दिन भी ऐसा नहीं गुजरा जब इस मां ने अपनी बच्ची को गले से न लगाया हो..उसे अपने हा​थों से खाना न खिलाया हो...।            लेकिन आज उसकी देखभाल की जिम्मेदारी से मुंह फेर कर ये मां क्यूं चल पड़ी है उस रास्ते पर जहां पर सिर्फ ख़तरा है। घर वाले जानते है कि जिस मिशन को सफल बनाने के लिए उनकी ये बेटी, बहू और पत्नी बाहर निकली है उसकी जान सुरक्षित नहीं हैं...फिर क्यूं वे उसे नहीं रोकते

लॉकडाउन में 'लेडी वॉरियर'

          आज पूरा विश्व जहां कोरोना जैसी  महामारी से जूझ रहा है। वहीं देश के भीतर ऐसे नायक और नायिकाएं भी है जो अपनी जान की परवाह किए बगैर अपनी ड्यूटी बड़ी मुश्तैदी के साथ निभा रहे है। संकट के बीच ड्यूटी निभा रहे इन कोरोना वॉरियर्स  की जितनी तारीफ की जाए वह कम है। जगह—जगह से हमें कहीं पुलिस वाले तो कहीं डॉक्टर्स, नर्स और सफाई कर्मचारियों द्वारा की जा रही सेवा के किस्से कहानी सुनने को मिल रहे है। और हो भी क्यूं ना, इनका ज़ज्बा ही कुछ ऐसा है।         ऐसे ही कोरोना वारियर्स में इस नायिका का नाम भी शामिल है जो ख़ुद शारीरिक चुनौतियों का सामना कर रही है। लेकिन इस मुश्किल हालात में अपनी ड्यूटी पर डटी हुई है। ये है उषा शर्मा, जो चित्तौड़गढ़ जिले के महिला एवं बाल चिकित्सालय में एक सीनियर महिला नर्सिंगकर्मी है। उषा पिछले सत्ताइस सालों से मेडिकल सर्विस में है। और पिछले एक दशक से अधिक समय से व्हील चैयर पर है। लेकिन अपनी ड्यूटी और फर्ज़ के प्रति बेहद ईमानदार है।        आज जब देश को इनकी सेवा की ज़रुरत है तो ये अपनी शारीरिक तकलीफ को भूलकर सेवा में जुट गई है। और दूसरों की जान बचाने के लिए ड्यू

लॉकडाउन में जीवन की 'कोलाहल'

      पिछले छह महीने से बनीं हुई रौनक आज एकदम ख़त्म हो गई। बुरी तरह से सन्नाटा पसर गया है। अब न तो घर्र—घर्र करती हुई मशीन का शोर हैं और ना ही ऐ ऐ ऐ ऐ ऐ..ओ ओ ओ की चिल्ला पौ....। अब शाम को कोई चुल्हा नहीं जलता यहां..पानी की टंकी के नीचे बैठकर अब कोई नहाता हुआ या कपड़े धोता हुआ नज़र नहीं आता...और ना ही अब एक—दूसरे के पीछे पकड़म पकड़ाई का खेल खेलते हुए, दौड़ते हुए कोई बच्चा दिखता है। सबकुछ थम सा गया है। एक अजीब सी ख़ामोशी है जो रह रहकर अकेले होने का आभास कराती है।       वाकई बस्ती तो इंसानों से ही होती है। वरना तो सब सुना और बंजर है। राधिका अपने फ्लेट की बालकनी में बैठी हुई ये सब सोच रही थी। इसी सोच की गहराई में डूबी राधिका छह महीने पीछे चली गई।        वह सोचने लगी कि छह महीने पहले सामने वाली ज़मीन एकदम खाली पड़ी थी। बारीश का मौसम होने के कारण इस ज़मीन पर कांटेदार बड़ी—बड़ी झाड़ियां उग आई थी। लेकिन आज यहां एक बिल्डिंग खड़ी हो गई है। ये बात अलग है कि इसका निर्माण पूरी तरह से नहीं हुआ है। लेकिन इसे बनाने वालों ने इसमें जान सी डाल दी थी। जब से इसका निर्माण शुरु हुआ था उसीे दिन से यहां ज