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Showing posts from May, 2020

लॉकडाउन में मकान मालिक को 'ज़िंदगी का सबक'

                          साल भर पहले की बात है डॉक्टर रोहिताश पत्नी और बच्चों के साथ इस शहर में ट्रांसफर होकर आए थे। यहां उनका अपना कोई जानने वाला नहीं था। शहर की हर चीज़ उनके लिए नई थी। लेकिन धीरे—धीरे उन्हें शहर की आबो हवा रास आने लगी थी। और फिर डॉक्टरी पेशे को देखकर हर कोई उनसे अपनी जान पहचान रखना चाहता था। इसीलिए उन्हें बिना किसी मशक्कत के अस्पताल के नज़दीक ही एक मकान भी किराए पर मिल गया था।         अब डॉक्टर रोहिताश की दिनचर्या इस नए शहर और अपने प्रोफेशन के साथ ढलने लगी थी। वे रोज़ाना अस्पताल के लिए निकल जाते। इसके बाद उनके दोनों बच्चे और पत्नी अपनी दिनचर्या के साथ व्यस्त हो जाते। डॉक्टर रोहिताश को इस बात का भी सुकून था कि उनका परिवार एक अच्छी जगह पर रह रहा है। मकान मालिक राघव भी उनके रहने से बेहद खुश थे। हर काम के लिए डॉक्टर साब...डॉक्टर साब...कहते हुए थकते न थे। दोनों परिवारों में खूब बनती।          लेकिन कहते है ना कि जब बुरा वक़्त आता है तब अपने और अपनेपन दोनों की ख़ूब पहचान होती है। शायद डॉक्टर रोहिताश और उनके परिवार के लिए ऐसे ही समय की ये दस्तक थी।            हर र

लॉकडाउन में 'दादी से पहचान'

    कॉलेज निकलते वक़्त दादी का रोज—रोज टोकना बेहद अखरता था। मन करता कि उन्हें जमकर भला बुरा सुना दूं लेकिन पापा का ख़्याल आता और फिर बस चुप हो जाती। उनकी 'मां' जो ठहरी वे....।  इधर मम्मी भी कम ना थी..वे जानती थी कि मुझे दादी का रोज—रोज रोकना टोकना पसंद नहीं फिर भी वे मुझे उनके कमरे में जाकर प्रणाम कहकर आने को बोलती। अकसर इस बात को लेकर मम्मी—पापा से बहस भी हो जाया करती। और इस बात पर मुझे सिर्फ दादी पर ही गुस्सा आता। एक बार तो मेेरे मुंह से ये तक निकल गया कि इतनी बूढ़ी हो गई है..और कितना जिएंगी  ये..।         इस बात ने मम्मी—पापा का बहुत दिल दु:खाया था। लेकिन उस वक़्त मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। आज सोचती हूं कि काश..उस वक़्त फ़र्क पड़ा होता...काश कि ऐसी बात मेरे मुंह से निकली ही नहीं होती....।       लॉकडाउन ने जैसे ही भागदौड़ की लगाम को कसा तभी सोनू को असल ज़िंदगी की गति का अहसास भी हुआ। इन बीते दो महीनों में उसने अपनी दादी के साथ जो पल बिताएं है वे उसकी ज़िंदगी के सबसे बेहतरीन पलों में शामिल हो गए है। लेकिन इससे पहले तक उसने कभी भी अपनी दादी से सीधे मुंह बात तक नहीं की थ

लॉकडाउन में 'बूढ़ी आंखों की उम्मीदें'

           अब से पहले कभी भी ये शहर इतना सुनसान और अपने आप में इतनी खामोशी लिए हुए न था...न जाने किसकी नज़र लग गई है मेरे इस सपनों के शहर को...। बस एक ये ही तो बचा है जिसे देखकर जी लेती हूं..अब ये भी मौन हो चला है...फिर मन की बात किससे कहूंगी...कौन है जो मेरे जीवन का अकेलापन मुझसे साझा करेगा...। भगवंती अपने शहर के इस सन्नाटें को देखकर आज बेहद दु:खी है...चारों तरफ रेगिस्तान सी खाली पड़ी जगह...न इंसान नज़र आता है और ना ही इंसानों की चहल कदमी का शोर है..।   वह उन पलों को याद करती है जब पचास बरस पहले अपने पति के साथ इसी शहर में ब्याह कर आई थी। भगवंती एक छोटे से गांव में पली बड़ी थी। उसने कभी नहीं सोचा था कि एक बड़े शहर में उसका ब्याह होगा और पति के साथ बेहद ही सुकून और शांति से जीवन बीतेगा। बस इसी वक़्त से उसे इस शहर से बेहद लगाव हो गया था। धीरे—धीरे वक़्त बीता और पति ने उसके लिए एक सुंदर सा मकान बनवाया। जिसे भगवंती ने वास्तविक रुप में घर बनाया था।              घर का एक—एक कोना प्यार से सजा हुआ था...घर की दीवारें ईंट, चूना और पत्थर से जरुर बनीं थी लेकिन सच तो

लॉकडाउन में एक 'मां' का फैसला

      'मां'... इस एक शब्द में कितना सुकून हैं ...। जहां भर की खुशियां सिर्फ इसी एक शब्द में सिमट आई हैं...। जब भी मैं खुश होती हूं या फिर किसी बात को लेकर परेशान या दु:खी होती हूं तो मुझे अपनी मां की याद आने लगती है और इसी के साथ उसके आंचल के सुखद अहसास की अनुभूति भी होने लगती है। लेकिन आज मन इतना बैचेन और अशांत हो चला है...जहां पर एक 'मां' के रुप में ख़ुद को तो पाती हूं लेकिन अपनी बेटी के लिए वो अहसास महसूस नहीं कर पाती हूं जो मैंने अपनी मां से लिया है। लेकिन क्या सिर्फ इतना ही भर सोच लेना काफी होगा मेरे लिए, शायद नहीं।         आज सुबह से ही काजल का अंर्तरमन सोच की गहराई में डूबा हुआ है। क्योंकि आज उसकी बेटी ने उसके सामने वो छोटी—छोटी इच्छाएं रखी है जिसे वो अपनी मां के साथ पूरा करना चाहती है...।            जब काजल ने अपनी बेटी अनन्या से हंसकर पूछा कि बताओं क्या करना है मुझे..तब अनन्या ने बेहद ही भावुक होकर कहा कि '' जब सुबह उसकी नींद खुले तो वो उसके पास हो...उसके सर पर हाथ फेरे, उसे लाड़ प्यार करें...उसके टिफिन बॉक्स में पसंद का खाना दें...उसकी फैंड्स की तर