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लॉकडाउन में एक 'मां' का फैसला


      'मां'... इस एक शब्द में कितना सुकून हैं ...। जहां भर की खुशियां सिर्फ इसी एक शब्द में सिमट आई हैं...। जब भी मैं खुश होती हूं या फिर किसी बात को लेकर परेशान या दु:खी होती हूं तो मुझे अपनी मां की याद आने लगती है और इसी के साथ उसके आंचल के सुखद अहसास की अनुभूति भी होने लगती है। लेकिन आज मन इतना बैचेन और अशांत हो चला है...जहां पर एक 'मां' के रुप में ख़ुद को तो पाती हूं लेकिन अपनी बेटी के लिए वो अहसास महसूस नहीं कर पाती हूं जो मैंने अपनी मां से लिया है। लेकिन क्या सिर्फ इतना ही भर सोच लेना काफी होगा मेरे लिए, शायद नहीं।
       
आज सुबह से ही काजल का अंर्तरमन सोच की गहराई में डूबा हुआ है। क्योंकि आज उसकी बेटी ने उसके सामने वो छोटी—छोटी इच्छाएं रखी है जिसे वो अपनी मां के साथ पूरा करना चाहती है...।  
         जब काजल ने अपनी बेटी अनन्या से हंसकर पूछा कि बताओं क्या करना है मुझे..तब अनन्या ने बेहद ही भावुक होकर कहा कि '' जब सुबह उसकी नींद खुले तो वो उसके पास हो...उसके सर पर हाथ फेरे, उसे लाड़ प्यार करें...उसके टिफिन बॉक्स में पसंद का खाना दें...उसकी फैंड्स की तरह सुंदर—सुंदर चोटी बनाएं...उसके साथ कार्टून देखें...गेम्स खेलें..। 

    काजल बिना कुछ कहें उसे सुनती रही, उसकी आंखे भर आई और फिर उसने अनन्या को गले से लगा लिया। लेकिन आज काजल का दिल टुकड़े—टुकड़े हो रहा था। आज उसकी बेटी ने उसके सामने वो नन्ही ख्वाहिशें रखी जो हर एक बच्चे का वास्तविक हक है। एक नन्हें दिल में न जाने कब से ये छोटी—छोटी ख्वाहिशें होंगी...जो सिर्फ अपनी मां के फुर्सत के क्षणों को ढूंढ रही होंगी..कब मां खाली दिखे और कब में उन्हें ये बताउंगी। 
 अपनी बेटी की ख्वाहिशों ने काजल के सामने एक ऐसा सवाल खड़ा कर दिया था, जो उससे पूछ रहा है कि क्या वह एक 'मां'  है...।
         
       भागदौड़ की ज़िंदगी और प्रतिस्पर्धा की दौड़ के साथ—साथ टारगेट को पूरा करने के दबाव में काजल ने अपनी बेटी को सिर्फ बचा हुआ वक़्त दिया था। मेट्रो सिटी और घर से ऑफिस के बीच लंबी दूरी का सफ़र समय पर तय करने की मजबूरी के कारण काजल को सुबह जल्दी ही निकलना पड़ता था...इस वक़्त उसकी बेटी नींद में होती थी। काजल रोजाना ही उसके सर पर हाथ फेरकर निकल जाती थी।

       इसके बाद अनन्या के उठने से लेकर उसे स्कूल भेजने तक का सारा काम उसके पापा ही करते। तेड़ी—मेढ़ी चोटी..और लंच में कोई वैरायटी नहीं..वही सेंडविच या परांठा...। फिर जब वह स्कूल से आती तो उसे कभी आया संभालती या कभी उसे क्रेच में समय बिताना पड़ता। 

         शाम को जब मां घर आती तो वह उसे गले लगाती फिर उससे उसकी दिनभर की बातें पूछती। कुछ देर उसके साथ खेलती..उसका होमवर्क करवाती...लेकिन शाम का खाना, बर्तन, साफ—सफाई, और वे सभी काम जिसे वो सुबह नहीं कर पाती थी उसे पूरा करने का टारगेट भी उसके सामने होता था। इसीलिए वो अनन्या को कुछ ना कुछ काम देकर व्यस्त करने की कोशिश करती। काजल काम निपटाती रहती और उसे दिलासा देती रहती हां बस अभी आई..
   अनन्या बीच—बीच में उसे आवाज़ लगाती रहती। इंतजार करते—करते अनन्या को कभी नींद लग जाती तो कभी वह रोते हुए काजल के पास जाकर उससे लिपट जाती...।
     
      एक वर्किंग वीमन के रुप में काजल के पास समय कम था और वह एक मशीन की तरह लगातार घर और ऑफिस के टारगेट को पूरा कर रही थी। रोजाना वो इसी दिनचर्या के साथ जी रही थी। अपनी बेटी को एक बेहतर वक़्त नहीं दे पाने का उसे भी बेहद दर्द था।
    आज जब पूरा देश लॉकडाउन में है। ऐसे में काजल पूरे वक़्त घर पर है और घर ही से ऑफिस का काम कर रही है। अनन्या अपनी मां को घर पर देखकर बेहद खुश है। क्योंकि उसकी मां अब वो काम भी कर रही हैं जिसे अब तक पापा करते थे...इतना ही नहीं अब मां उसके साथ कार्टून भी देखती है और उसकी सुंदर—सुंदर चोटी भी बनाती है और उसे अपनी पसंद की डिश भी मिल रही है। अनन्या इन पलों को रोज ऐसे ही जीना चाहती है। 
     काजल सोचती है कि आज अनन्या आठ साल की हो गई है और अब भावनाओं की अभिव्यक्ति और उनके अहसास को भी समझने लगी है। लेकिन जब वह पैदा हुई थी तब वह उसे उसके हिस्सा का वो 'समय' नहीं दे सकी। जो मासूमियत और नन्हीं अठखेलियों से भरा था। वो 'समय' जिसे सिर्फ मां के आंचल की चाह थी..। वो 'समय' जिसकी नन्हीं हथेलियों और अंगुलियों को सिर्फ मां के स्पर्श की चाहत थी।
          
लॉकडाउन के बहाने ही सही लेकिन इस वक़्त जो पल काजल अपनी बेटी के साथ गुज़ार रही हैं वह अब उसे खोना नहीं चाहती। लेकिन क्या मोटी तनख़्वाह और स्टेटस का पर्याय बन चुकी नौकरी छोड़कर वो पति को घर चलाने में सहयोग दे पाएंगी। 
     इसी कशमकश में उलझी हुई थी काजल तभी उसकी बेटी दौड़कर उसके पास आती है और वह उसे गले से लगा लेती है। इस पल की कोई कीमत नहीं...ये चला गया तो फिर लौटकर नहीं आएगा...। जबकि घर चलाने के लिए तो कई सारे विकल्प खुले है। काजल आसमां की तरफ देखती है और मुस्कुराती है। वह अब दृढ़ निश्चियी होकर घर ही से कोई काम शुरु करने का निर्णय लेती है..।
         काजल ने मन ही मन फैसला कर लिया कि अब वो अपनी बेटी को उसके वास्तविक हक से वंचित नहीं होने देंगी। और फिर वह आत्मविश्वास भरे कदमों के साथ रसोई की और बढ़ गई...।
     
      ये कहानी सिर्फ काजल की ही नहीं है बल्कि उन तमाम माओं की है जो हर रोज़ घर और नौकरी की दोहरी ज़िदगी से गुजर रही थी। लेकिन आज लॉकडाउन में वे कहीं ना कहीं उन पलों के अहसास को जी रही होंगी जो उनके जीवन में कहीं छूट गए हैं या अधूरे रह गए है।

Comments

  1. ब्हुत ही खूब दीदी, शानदार चित्रण किया शब्दों से।

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