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लॉकडाउन में 'बूढ़ी आंखों की उम्मीदें'

    
      अब से पहले कभी भी ये शहर इतना सुनसान और अपने आप में इतनी खामोशी लिए हुए न था...न जाने किसकी नज़र लग गई है मेरे इस सपनों के शहर को...। बस एक ये ही तो बचा है जिसे देखकर जी लेती हूं..अब ये भी मौन हो चला है...फिर मन की बात किससे कहूंगी...कौन है जो मेरे जीवन का अकेलापन मुझसे साझा करेगा...। भगवंती अपने शहर के इस सन्नाटें को देखकर आज बेहद दु:खी है...चारों तरफ रेगिस्तान सी खाली पड़ी जगह...न इंसान नज़र आता है और ना ही इंसानों की चहल कदमी का शोर है..।  


वह उन पलों को याद करती है जब पचास बरस पहले अपने पति के साथ इसी शहर में ब्याह कर आई थी। भगवंती एक छोटे से गांव में पली बड़ी थी। उसने कभी नहीं सोचा था कि एक बड़े शहर में उसका ब्याह होगा और पति के साथ बेहद ही सुकून और शांति से जीवन बीतेगा। बस इसी वक़्त से उसे इस शहर से बेहद लगाव हो गया था। धीरे—धीरे वक़्त बीता और पति ने उसके लिए एक सुंदर सा मकान बनवाया। जिसे भगवंती ने वास्तविक रुप में घर बनाया था। 
      
     घर का एक—एक कोना प्यार से सजा हुआ था...घर की दीवारें ईंट, चूना और पत्थर से जरुर बनीं थी लेकिन सच तो ये है कि ये दीवारें भगवंती और उसके पति के बीच प्यार की मजबूत नींव पर खड़ी थी। उसके घर आंगन में सिर्फ खुशियों का ही डेरा था जो उसके दो बच्चों की हंसी ठिठौली और धमाल से और बढ़ जाया करती थी। समय यूं ही बीत रहा था। बेटा और बेटी दोनों की शादी भी हो गई। बेटी के पति का बिजनेस भी इसी शहर में था इसीलिए वो भी इसी घर में रहने लगा था। 
     
    भगवंती और उसका पति दिनरात अपने परिवार के कामों में व्यस्त रहते। भगवंती रसोई में अपनी बेटी और बहू का हाथ बटाती और उसका पति बाहर के काम जैसी सब्जी व राशन लाना, गाड़ी साफ करना, पेड़ पौधों की देखभाल करना जैसे कामों में मदद करते। सब कुछ आराम से और सुकून से चल रहा था। लेकिन दो साल पहले भगवंती के पति की हार्ट अटैक से मौत हो गई। ये दु:ख भगवंती के जीवनकाल की अग्नि परीक्षा से कम न था। पति की मौत के बाद घर वालों का व्यवहार भी भगवंती के प्रति बदलने लगा। कोई ना तो अब उसके पास आकर बैठता ना ही उसकी किसी बात को तवज्जों दी जाती। हर कोई उसे झिड़क रहा था। इतना ही नहीं अब तो उसे भोजन के लिए भी तरसना पड़ रहा है। जिस घर से भूखों के लिए खाना बनाकर वह दिया करती थी आज वह अपने ही घर में एक निवाले को तरस रही है। वह एक ऐसे दौर से गुज़र रही थी जिसकी उसने कभी कल्पना नहीं की थी। 
    
     पूरे परिवार के होते हुए भी भगवंती आज नितांत अकेली है...बिल्कुल इन खाली सड़कों की तरह...। जो बढ़ती हुई तो नज़र आती है लेकिन जिनकी मंजिल का अता—पता नहीं। लेकिन जीवन तो फिर भी जीना ही है इसी सोच के साथ भगवंती ने सुबह—शाम मंदिर आना—जाना शुरु किया। उसे मंदिर प्रांगण में प्रसादी के रुप में जो भी मिलता वो उसी से अपना पेट भर लिया करती। बेटा, बेटी, बहू और दामाद किसी ने भी उसके प्रति दया नहीं दिखाई। वे सभी ये भूल गए कि जिस घर में वे रह रहे हैं वो भगवंती का है। इस घर की एक—एक चीज उसकी बसाई हैं....। 
    
     वो चाहे तो सभी को इस घर से बेदखल कर दें...लेकिन मां है...अपने बच्चों को बुरे हाल में नहीं देख सकती...। इसीलिए वो चुप है....और इसी चुप्पी का मजाक बना रहे हैं ये बच्चे जिनके लिए दिनरात इस मां ने दिए हैं....।  

     आज जब पूरा देश लॉकडाउन में हैं ऐसे में भगवंती हाथ में कपड़े का एक खाली झौला लिए अपनी उम्र की लड़खड़ाहट के साथ खाली सड़कों पर बस चले ही जा रही है...सिर्फ उस निवाले की तलाश में जो मंदिर से उसे मिल जाया करता था....। वह किससे अपना दर्द बयां करें कि इतने बड़े घर की मालकिन होते हुए भी उसे अन्न के लिए यूं तरसना पड़ रहा है। वह इसी सोच में चल रही थी तभी उसे यूं अकेले सड़क पर देखकर पुलिस ने उसे रोका और पूछा कि वह कहां जा रही है। उसने बताया कि वो मंदिर जा रही हैं खाना लेने के लिए...। 
      
    पुलिसवालों ने उसे बताया कि मंदिर बंद है...कोई खाना नहीं मिलेगा अभी। भगवंती ने पुलिस को बताया कि उसने दो दिनों से कुछ नहीं खाया है...। ये सुनकर महिला पुलिसकर्मी ने अपने टिफिन में से उसे पहले भोजन कराया फिर उसकी पूरी बात सुनी...। पुलिसवाले जो लॉकडाउन की पालना कराने के लिए सड़कों पर तैनाती दे रहे थे वे भगवंती के हालात देखकर सोच में थे...। 

    ऐसे नाज़ुक वक़्त में कोई कैसे अपनों के साथ ऐसा बुरा बर्ताव कर सकता है। कुछ देर बाद पुलिस ने अपनी गाड़ी में भगवंती को बैठाया और उसे उसके घर तक छोड़ा। भगवंती को पुलिस के साथ देखकर घर वालों को बहुत गुस्सा आया। लेकिन वे कुछ कहते उससे पहले ही महिला पुलिसकर्मी ने उन्हें हिदायत दी कि भगवंती के साथ कोई बुरा व्यवहार नहीं करें...उसका खाना रोजाना ही पुलिस वाले देकर जाएंगे। साथ ही उसने ये भी कहा कि, लॉकडाउन में जहां कई लोग भूखों को भोजन करा रहे हैं...गरीबों तक राशन पहुंचाया जा रहा हैं...कुछ अपना पैसा दान कर रहे हैं तो कुछ कोरोना वारियर्स लोगों की जिंदगी सुरक्षित रह सके इसके लिए अपनी जान जोखिम में डाले हुए है। 
    
     ऐसे समय में अपनी बुढ़ी मां के प्रति ऐसी निर्दयता और अमानवीय होने में तुम्हें ख़ुद से शर्म नहीं आती। जो अपनी बुढ़ी मां का पेट नहीं भर सकते हैं वे समाज और देश के लिए ऐसे समय क्या सोचेंगे। ये कहकर पुलिस चली गई।  

घर वालों पर इसका असर हुआ या नहीं ये सिर्फ भगवंती ही जानती है। फ़िलहाल उसे पेट भरने की चिंता नहीं रही क्योंकि अब रोजाना ही पुलिसवाले उसे खाना देकर जाते है। लेकिन उसे अब भी एक ही चिंता सताए जा रही है। उसकी बूढ़ी आंखे अपने शहर के इस सन्नाटें और सुनेपन को देखकर बेहद दु:खी है।  
     
   उसकी प्रार्थनाओं में एक ही बात है कि फिर से मेरा ये शहर अपनी रौनक के साथ लौट आए...क्योंकि पति की मौत के बाद एक ये ही शहर तो हैं जिसकी चहल—पहल को देखकर उसमें जीने की उम्मीदें बाकी हैं....। 

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