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लॉकडाउन में 'दादी से पहचान'

    कॉलेज निकलते वक़्त दादी का रोज—रोज टोकना बेहद अखरता था। मन करता कि उन्हें जमकर भला बुरा सुना दूं लेकिन पापा का ख़्याल आता और फिर बस चुप हो जाती। उनकी 'मां' जो ठहरी वे....। 

इधर मम्मी भी कम ना थी..वे जानती थी कि मुझे दादी का रोज—रोज रोकना टोकना पसंद नहीं फिर भी वे मुझे उनके कमरे में जाकर प्रणाम कहकर आने को बोलती। अकसर इस बात को लेकर मम्मी—पापा से बहस भी हो जाया करती। और इस बात पर मुझे सिर्फ दादी पर ही गुस्सा आता। एक बार तो मेेरे मुंह से ये तक निकल गया कि इतनी बूढ़ी हो गई है..और कितना जिएंगी  ये..।  
      इस बात ने मम्मी—पापा का बहुत दिल दु:खाया था। लेकिन उस वक़्त मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। आज सोचती हूं कि काश..उस वक़्त फ़र्क पड़ा होता...काश कि ऐसी बात मेरे मुंह से निकली ही नहीं होती....।  

    लॉकडाउन ने जैसे ही भागदौड़ की लगाम को कसा तभी सोनू को असल ज़िंदगी की गति का अहसास भी हुआ। इन बीते दो महीनों में उसने अपनी दादी के साथ जो पल बिताएं है वे उसकी ज़िंदगी के सबसे बेहतरीन पलों में शामिल हो गए है। लेकिन इससे पहले तक उसने कभी भी अपनी दादी से सीधे मुंह बात तक नहीं की थी।

   वह सोचती है कि जब वह कॉलेज निकलती थी तब दादी सिर्फ उसका नाम ही तो पुकारती थी। जिसे उसने रोकना—टोकना समझ लिया था। दादी के कमरे में जब कभी वह खाना लेकर जाती तब भी दादी उसे अपनी बूढ़ी आंखों से अथाह प्यार लिए हुए देखती रहती मगर तब भी सोनू सिर्फ खाना रखकर चली आती...। वह दादी की तरफ ऐसे देखती मानो देखा ही नहीं..।
    लेकिन इन दो महीनों ने उसे दादी के पास बैठना, उनकी बातें सुनना और अपनी बातें सुनाना सीखा दिया हैं। अब तो आलम ये है कि सोनू दादी के साथ बैठकर ही खाना खाती हैं। और घंटों उनके कमरे में रहते हुए उनके साथ खूब बातें करती है।
    
    सोनू अपनी दादी के चेहरे की झुर्रियां और बूढ़ी आंखों की नमी देखकर सोचती है कि उसने सालों उन पलों को खो दिया जो वाकई सुकून और खुशी देने वाले थे। क्यूं बेवजह व्यस्त होने के नाम पर उसने दादी को इग्नौर किया। क्यूं व्यस्त होने का फिजूल ही हव्वा बनाया...अपनों से दूर रहकर या उन्हें अपने आप से दूर करके जीना ज़िंदगी की तरक्की नहीं हैं।
   वह ख़ुद से कहती है कि आज जिस तरह से अपनों के पास बैठने का वक़्त निकल रहा हैं वो तो पहले भी निकल रहा था लेकिन व्यस्तता के चौले में उस खूबसूरत वक़्त को छुपा दिया था। लेकिन अब नहीं..। ये वक़्त किसी भी दिखावे की ओट में नहीं छुपेगा बल्कि एक सुनहरी धूप की तरह फैलकर सिर्फ जिएगा..।

     तभी सोच में डूबी सोनू के सिर पर दादी ने अपना प्यार भरा हाथ फेरा। और उससे कहा कि आज वो उसे अपने आप से मिलवाएगी। सोनू एक पल के लिए चौंकी...। दादी ने कहा कि चौंकने वाली बात नहीं है..जाओ मेरे संदूक में एक एलबम रखी है वो ले आओ। सोनू ने एलबम लाकर दादी को दे दी।
    
   दादी ने जब सोनू को अपनी फोटो दिखाई तो वह हैरान थी कि दादी तो अपने बचपन से लेकर जवानी के दिनों में बेहद सुंदर लड़की रही है। दादी के लुक्स को देखकर वो दंग रह गई। सोनू का वेस्टर्न आउटफीट दादी के बैल बॉटम के आगे एकदम फीका है। दादी बहुत ही करीने से अपने बाल बनाकर रहती थी। उस पर अपने दाहिनें हाथ में बड़े मॉडल की घड़ी पहनने का अंदाज...।
    
     दादी की फोटो देखकर सोनू बेहद हैरान थी। इससे भी ज्यादा हैरानी उसे दादी की ये बात सुनकर हुई कि वो बॉटनी की प्रोफेसर थी। उस ज़माने में इस विषय का प्रोफेसर होना बहुत बड़ी बात हुआ करती थी। सोनू को अब तक सिर्फ ये ही पता था कि दादी टीचिंग लाइन में थी। दादी का लिविंग स्टैंडर्ड और अपने ग्रुप में एक उम्दा इमेज को देखकर सोनू को बहुत खुशी हुई लेकिन साथ ही उसे इस बात का गहरा पछतावा हुआ कि जिस दादी को वो सिर्फ अपने पापा की मां और एक साधारण बूढ़ी औरत ही समझ रही थी वो तो अपने वक़्त की एक बेहतरीन प्रतिभा रही है। उसकी आंखों से आंसू छलक पड़ें तभी दादी ने उसे अपने गले से लगाया और उसके आंसू पोंछें।
     
     दादी ने सोनू से कहा कि मेरी बच्ची मैं तो तुझे हमेशा ही आवाज़ लगाती रही लेकिन तु हमेशा जल्दी में रही। आज जब तु अपनी दादी के पास है तो सोचा कि अपना परिचय तुझसे करारुं..। मेरी आत्मा को अब जाकर शांति मिली। अब में चैन से मर सकूंगी क्योंकि मुझे अब इस बात की खुशी है कि मुझे मेरी पोती ने पहचान लिया है। वरना मैं बिना पहचान के यूं ही मर जाती। दादी की बात सुनकर सोनू की आंखों से सिर्फ आंसू ही बह रहे थे।
    
    दादी ने सोनू के हाथ में एलबम देते हुए कहा कि तुम्हारे हाथ में जो हैं वो अतीत हैं जो कभी बेहद सुंदर और अपने आप में एक संघर्ष व खुशहाली के साथ रहा होगा। एक ऐसा कल जो कभी मेरा था आज वो तुम्हारा है और इसे कभी खोना नहीं। क्यूंकि जो हैं वो सिर्फ इसी पल में है।
   सोनू अपनी दादी से लिपट जाती है और उससे कहती है कि दादी आप कभी भी मुझे छोड़कर मत जाना। आप बूढ़ी नहीं हुई हो..आपको अभी बहुत जीना है...। सोनू दादी से उस दिन के लिए भी माफी मांगती है जब उसने गुस्से में कहा था कि और कितना जिएंगी वे..। दादी उसके माथे को चूमती है और कहती है कि रोना नहीं, अभी समझाया ना तुम्हें कि, जो है बस यही एक पल है...मुस्कुराओं..। दोनों हंस पड़ती हैं...। लेकिन सोनू आज बेहद खुश है क्योंकि लॉकडाउन ने उसे अपनी दादी से पहचान करा दी है। और उसे इस भावनात्मक रिश्ते को समझने का मौका दिया है जिससे अब तक वो अनजान थी। 

    यह कहानी सिर्फ सोनू की ही नहीं हैं बल्कि उन तमाम बच्चों की है जो अब तक पढ़ाई, करियर और जॉब के नाम पर इन रिश्तों के महत्व को नहीं समझ पाए और इनसे दूर भागते रहे। जिनमें न सिर्फ भरपूर प्यार व स्नेह है बल्कि एक लंबे अर्से का एक गहरा अनुभव भी है। निश्चित ही लॉकडाउन ने ऐसे बूढ़े हो चुके रिश्तों को समझने का एक अवसर ज़रुर दिया है। 

Comments

  1. बहुत ही उम्‍दा लेख है, जिसमें पारिवारिक संबंधों एवं जनरेशन गेप का अच्‍छा चित्रण किया है।

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  2. Replies
    1. आपका धन्यवाद। आप कृपया अपना नाम भी लिखें। इससे मुझे आपको संबोधित करना आसान रहेगा।

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