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Showing posts from June, 2020

'झम्मक' लड्डू

         चिलचिलाती धूप...माथे से टपकता पसीना...और बेसब्र आंखों से बल्लू का इंतजार करना। ये सिर्फ एक दिन की ही बात नहीं थी। बल्कि रोज़ाना ही भरी दोपहरी में नीम के पेड़ के नीचे बैठकर कंचों में गांव के छोरे छोरियों के साथ बाजी खेलते हुए निगाहें उसी पत्थर की सड़क पर बनी रहती जहां से बल्लू आता। खेल में कोई भी जीते इससे फर्क नहीं पड़ता लेकिन बल्लू एक दिन भी न आए तो जान पर बन आती...।       आज भी नज़रें सड़क पर ही थी...लेकिन बल्लू का अता पता नहीं। सड़क पर सन्नाटा पसर रहा था। हां, साइकल पर सवार और मुंह को कपड़े से ढ़ाके हुए गांव के पाटीदार बा ज़रुर नज़र आ रहे थे। ये अकसर इसी समय अपने खेत से घर आते थे।   लेकिन ये बल्लू आज कहां मर गया...गला सुखने को आ गया...।    वाकई ये ख़्याल ऐसा लगता है मानो अभी—अभी की ही बात हो...। आज भी वो पत्थर की सड़क.. नीम का पेड़... मंदिर का ओटला...और वो बल्लू का इंतजार..यादों की गहराई में छूपा हुआ है लेकिन अब भी वो वर्तमान की आंखों में यूं तैरता है जैसे बल्लू आएगा और सब के सब दौड़ पड़ेंगे उसकी ओर...।           ये कहानी है जीवन के उस एक अंश की जो बीता हैं एक ऐसे गांव

ज़िदगी का दुश्मन है नशा

      राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था कि  'नशा मानव बुद्धि और शरीर के साथ—साथ उसकी आत्मा को भी नष्ट कर देता हैं।'  गांधी जी की ये बात वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, जब इस वाक्य का जन्म हुआ होगा। दुनिया के तमाम देशों में नशे की ज़द में फंसे लोगों पर कई तरह के अध्ययन, शोध और रिपोर्ट्स तैयार हुई हैं। लेकिन नशे की लत से लोगों और खासकर युवा पीढ़ी को निकालने में आज भी समाज और सरकारों को कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।            यदि नशे की लत में फंसे लोगों की बात हो तो इसकी चपेट में आने वालों में सबसे बड़ा हिस्सा युवाओं का है। जो शराब, सिगरेट, तम्‍बाकू एवं ड्रग्स जैसे जानलेवा पदार्थों का सेवन कर रहा है। नशे की लत ने युवाओं को उस स्तर पर लाकर खड़ा कर दिया है कि वो इसे पूरा करने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है और जब उसे ये मादक पदार्थ नहीं मिलता है तब वह जुर्म तक कर डालता है।       आज 'अंतरराष्ट्रीय नशा निरोधक दिवस' हैं और ये दिन मादक पदार्थों से मुक़ाबले का प्रतीक बन गया है। इस अवसर पर मादक पदार्थों के उत्पादन, तस्करी एवं सेवन के दुष

'मां' की भावनाओं का 'टोटल इन्वेस्टमेंट'

      हर सुबह की तरह आज की सुबह न थी। आज ना तो सूरज की किरणें घर के भीतर झांक रही थी और ना ही धूपबत्ती की खुशबू से घर महक रहा था। चारों तरफ एक अजीब से ख़ामोशी थी जो किसी की कमी होने का अहसास करा रही थी।       सोहन की जब नींद खुली तो वह चौंक गया ये सब देखकर। सुबह के आठ बज चुके हैं लेकिन अभी तक घर में इतनी शांति क्यूं है। वह खिड़की से पर्दा हटाता है तब उसे सुबह की रोशनी दिखाई देती है। वह अपनी पत्नी रेणु को नींद से जगाता है। और कमरे से बाहर आता है। आज रसोईघर में ना तो बर्तनों की आवाज़ आ रही हैं और ना ही बाबूजी अख़बार पढ़ रहे है। वह पूरे घर के पर्दे खोलता है। और मां—बाबूजी के कमरे का दरवाजा खटखटाता है।            बाबूजी दरवाजा खोलते हैं वे भी हैरान है कि आज उनकी नींद क्यूं नहीं खुली। वे देखते हैं कि आज सोहन की मां रेवती भी अभी तक सो रही है। वे भी सोच में पड़ जाते हैं कि सालों से सबसे पहले उठने वाली उनकी पत्नी रेवती आज इतनी देर तक क्यूं सो रही हैं। वे उसे जगाते हैं। रेवती उठती हैं लेकिन वह बहुत थकान महसूस कर रही थी। उसने कहा कि उसकी तबीयत कुछ ठीेक नहीं हैं इसीलिए वो दवा लेकर आज आराम ही क

'पिता' को बलिदान का तोहफा....

       दिल रो रहा है...आत्मा फट रही हैं....आंसूओं का सैलाब है जो थमने का नाम ही नहीं ले रहा हैं। जिन कांधों पर बैठाकर उसे बचपन में घुमाया था...आज उन्हीं कांधों पर उसकी अर्थी को उठाकर जा रहा हैं एक बाप...।      अपने जिगर के टुकड़े से अभी बहुत कुछ सुनना और देखना बाकी था। बहुत सारी बातें थी जो एक बाप अपने बेटे से और एक बेटा अपने बाप से करना चाहता था। लेकिन सुनने और सुनाने के लिए अब इस पिता के पास अपना बेटा नहीं हैं। किससे कहेगा मन की बात...सुख और दु:ख के पल अब किससे करेगा साझा....।       ये कहानी है उन तमाम पिताओं की। जिनके बेटे देश पर मर मिटे हैं...ये कहानी हैं उन पिताओं की जिनकी बूढ़ी आंखों में अपने बेटे का ज़ख्मी चेहरा हैं...ये कहानी हैं उन पिताओं के दर्द की जिसकी दवा नहीं....। बस इनके दिलों में एक ही आवाज़ का शोर शेष रह गया है जो चीख—चीखकर कह रही हैं कि देश पर मर मिटने वाले कभी मरा नहीं करते...। अपने बेटों की यादों में ही इन्हें अपनी सारी ज़िंदगी गुज़ारनी होगी।            आज 'फादर्स—डे' हैं। और देश, दुनिया में इसे अलग—अलग रुप में सेलिब्रेट किया जा रहा है। कहीं कोई अपने

'सैनिक' सीमा पर, देश के अंदर 'हम' मोर्चे पर...

    जिस तरह से हमारे बहादुर सैनिक हमारे देश की सीमा पर चाइना से लोहा ले रहे हैं और शहीद हो रहे हैं...... अब वक्त आ गया हैं....हम भी हमारे इन वीर सिपाहियों के कंधे से कंधा मिलाकर उनकी इस जंग में सहयोग करें।        इसके लिए हमको हथियार उठाकर किसी एक्चुअल लाइन ऑफ कंट्रोल 'एलएसी' पर जाने की ज़रुरत नहीं हैं। हम सभी अपने घर बैठे ही 'चाइना' को हरा सकते हैं। मेरा इशारा किस तरफ हैं आप सभी समझ रहे होंगे।  चाइना का आर्थिक बहिष्कार करके हम ना सिर्फ अपने वीर शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि दे सकते हैं बल्कि वहां तैनात वीर सपूतों को हौंसला दे सकते हैं।           पूरे देश को कोरोना का वायरस देकर चैन की नींद सो रहे चाइना को इस तरह की हरकत करने में बिल्कुल भी शर्म नहीं आती हैं। ऐसा करके वह ना सिर्फ अंतरराष्ट्रीय संबंधों को धत्ता बता रहा हैं बल्कि एक पड़ौसी देश होने के धर्म को भी भूल गया हैं।           हमारे देश की आज़ादी के बाद से समय—समय पर रह—रहकर 'मेड इन इंडिया' से लेकर स्वदेशी अपनाओं के नारे गूंजते रहे और सुनाई देते रहे....। लेकिन आज वक्त आ गया हैं इन नारों को हक़ीकत में ब

एक मुस्कुराता चेहरा 'सुशांत'...

       क्या कुछ नहीं था सुशांत सिंह राजपूत के पास। दौलत...शोहरत और स्टारडम...। एक इंसान की पूरी उम्र लग जाती है इन सभी चीज़ों को हासिल करने में। फिर क्या वज़ह बन जाती है जब ज़िंदगी को यूं ही अलविदा कह दिया जाता है। सुशांत जैसे हंसमुख अभिनेता का सुसाइड कर लेना अपने पीछे कई अनगिनत सवाल छोड़ गया है। आख़िर गमों का कौन—सा पहाड़ था जिसके नीचे इतनी सुंदर ज़िंदगी दबकर रह गई..।            एक सितारा जो आम व्यक्ति के दिलों में राज करता है..जिसे आदर्श मानकर कई युवा अपने जीवन को जीते हैं। यदि वो ही ज़िंदगी की जंग में जब ख़ुद से हार जाते हैं तब बहुत बुरा लगता है। फिल्मी परदों पर जिस किरदार के रुप में ये अभिनेता अपने डायलॉग से आदर्श स्थापित करते हैं जब वे ही इन आदर्शो पर असल ज़िंदगी में खरे नज़र नहीं आते हैं तब सामान्य व्यक्ति के लिए यह बेहद सोचने वाली बात बन जाती है। मध्यम वर्गीय परिवार से आने वाले  सुशांत का मरना युवाओं के बीच एक अच्छा संदेश देकर नहीं जाता है। सुशांत एक ऐसे कलाकार बनने की दिशा में थे जिससे आज का नौजवां हौंसला पाता था।               लेकिन हमें ये भी समझना होगा कि आख़िर वो कौन—स

'जल' संकट बन जाएगा 'महासंकट'

      वर्तमान मेें जिस तरह से कोरोना वायरस का खौफ पूरे विश्व पटल पर छाया हुआ है और हालात यह हो गए है कि उसे वैश्विक महामारी तक घोषित कर दी गई है। ठीक उसी तरह से भूजल की स्थिति भी भयावह होने वाली हैं। वहीं हमारे प्रदेश के भूजल की तस्वीर देखें तो सिहरन पैदा हो जाती है।         आज विश्व 'जल' दिवस   है और ये दिन पूरी तरह से पानी और इसके संरक्षण के महत्व पर केंद्रित है। हर साल इस दिन पूरे विश्व भर में पानी से संबंधित मुद्दों पर चर्चा की जाती है। पानी के बारे में अधिक जानने और पानी के संकट को दूर करने व सुधार लाने के लिए दुनिया भर के लोगों को प्रेरित किया जाता है। इन तमाम प्रयासों के बाद जब भू-वैज्ञानिक लगातर घट रहे जल स्तर की बात करते हैं तो ये वाकई एक बड़ी चिंता का विषय है।     हाल ही में भू-वैज्ञानिकों ने जल संकट को महासंकट बताया है। वैज्ञानिकों के अनुसार 2050 में जल संकट सबसे बड़ा संकट होगा। अभी अफ्रीकी और एशियाई देशों में पांच में से एक व्यक्ति पानी के लिए जूझ रहा है। वहीं 2050 में साढ़े पांच अरब लोग पानी के संकट से जूझ रहे होगे। यूएनओ ने भी माना कि 2025 तक पानी एक महासंकट होन

याद आई भारतीय परंपराएं

             पूरे विश्व में कोरोना के कहर का शोर है। लेकिन कोरोना वायरस से निपटने की ना तो सही दवा की खोज हुई है और ना ही सही इलाज का अब तक पता लगा है।   लेकिन कोरोना से बचने के विकल्प के नाम पर बार—बार हाथ धोने की जो चिल्लाहट मची हुई है उससे एक बात तो साफ लगती है कि आज भी परंपरागत सफाई का ये तरीका सारी बीमारियों से बचने का राम बाण इलाज तो है।           इतना ही नहीं पूरे विश्व में इस बात को लेकर भी जमकर प्रचार किया जा रहा है कि हाथ जोड़कर 'नमस्ते' करो किसी से हाथ मत मिलाओ।                 पिछले दिनों विश्व शक्ति ने इसे अपनाया तो तरह—तरह की बातें हुई। बहरहाल उस पक्ष पर क्यूं बात हो। खैर, सुकून और दिली खुशी तो ये है कि आज पूरा विश्व भारतीय परंपरा को अपनाने की बातें कर रहा है भले ही ये भय के कारण हो। आज हम आधुनिकता की सीढ़ियां क्या चढ़ने लगे अपने आधार को ही भूलते जा रहे है। सनातन धर्म, हिंदू परम्परा और भारतीय संस्कृति के अनुसार किसी से मिलते समय या किसी से अभिवादन करते समय हाथ जोड़कर प्रणाम किया जाता हैं या पूजा पाठ के समय हाथ जोड़े जाते हैं।           दरअसल,

दो जून की रोटी...

      सदियों से ये एक कहावत चली आ रही है। अकसर हमने कई बार इसका प्रयोग आम बोलचाल के रुप में भी किया होगा। लेकिन   'दो जून की रोटी'   के अर्थ की शुरुआत कब और कैसे हुई इसमें ना उलझे और इसके अर्थ की गहराई को समझे तो शायद आज के हालातों पर ये कहावत फीट ही बैठती हैं। इसका मतलब ये कतई नहीं कि रोटी की ज़रुरत सिर्फ जून माह में ही होगी। क्योंकि 'पेट और भूख के बीच सिर्फ एक निवाले की ज़रुरत है इसीलिए हर किसी को ये रोटी चाहिए ही'...।      लॉकडाउन में जब अर्थव्यवस्था के गड़बड़ाने की ख़बरे जोरों पर है तो ऐसे में इसी दो वक़्त की जून की रोटी को कमाने के लिए अब लोगों के पसीने छूट रहे है। छोटा—मोटा कामधंधा करने वाले हो या फिर नौकरीपेशा आदमी। सभी की हालत एक सी लगती है। ऐसे में नौकरी चली जाना या धंधा ही चौपट हो जाना कितना दर्द दे रहा होगा। फिर उन हाथों की तो छोड़ों जो सिर्फ रोटी के लिए ही सुबह से शाम तक मजदूरी कर रहे होते है।                 ये समय वो है जब हजारों, लाखों व करोड़ों हाथों को इसी दो वक़्त की रोटी के लिए हर संभव प्रयास करना होगा। जिनके पास जमा दौलत व पूंजी है वो भी कब तक

'लाला' की दुकान अब भी है 'चालू'

    पिताजी का एक ही राग था। ठाला माला मत बैठ कुछ काम धंधा कर लें। लेकिन सोमित को उनका यूं रोज—रोज एक ही राग अलापना बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता। वो या तो अपने कान बंद कर लेता या फिर घर से बाहर चला जाता। मां बेचारी इन दोनों के बीच पीस जाती। बेटे का पक्ष लें तो पिता नाराज़ और पिता का पक्ष लें तो बेटे का चेहरा उतर जाता। इसीलिए वह सिर्फ दोनों की सुनती लेकिन किसी के लिए भी कुछ ना कहती।  मन ही मन उसे अपने पति का कहा हुआ सही भी लगता। क्यूंकि ज़ज्बातों से तो पेट नहीं भरता है। पेट और भूख के पीछ निवाले की ज़रुरत होती है जो बगैर पैसों के नहीं मिल सकता। इस निवाले की ख़ातिर ही इंसान को न जाने कितनी मेहनत करनी पड़ती है।         मगर सोमित ये कैसे समझता। बचपन से वह विदेश जाने का सपना देख रहा है। उसकी ख़्वाहिश है कि वो कोई बड़ा बिजनेस करें जिसमें खूब पैसा हो और फिर विदेश में बैठकर अपना बिजनेस चलाए। इसीलिए वो पिताजी के बताएं हुए काम ना तो सुनता और ना ही उन कामों को करनी की सोचता। धीरे—धीरे वक़्त रेत की तरह फिसल रहा था लेकिन बाप—बेटे के बीच काम को लेकर रोजाना नोंक—झोंक होती रही।         एक दिन सोम