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Showing posts from July, 2020

'अर्थी' का बोझ ही शेष....

    सूजी हुई आंखें...कपकपाते हाथ...और छाती  में धड़क रहा बेबस कलेजा...बैठा हैं सड़क पर उन खिलौनों के बीच जो मासूम कांधे पर सवार होकर आज मेले में बिकने आए थे। लेकिन जो हाथ इन्हें बेच रहे हैं उनमें अब वो जान नहीं बची जो महज़ कुछ घंटों पहले तक थी। इन हाथों में मजबूर हालातों की उस अर्थी का बोझ ही शेष रह गया हैं जो सिर्फ सहारा बनकर मेले में आई थी...।    पड़ोस के गांव में आज मेला भरा है। कमला इस बात से बेहद खुश है। वो सोचती हैं मेले में खिलौने बेचकर कुछ पैसा कमा लेगी जो बीमार पति के इलाज और घर चलाने के काम आ जाएगा। इसीलिए वो अपने ही गांव के एक व्यापारी से करीब तीस हजार रुपए के खिलौने उधार ले आती हैं।     ये व्यापारी उसे कहता हैं कि कमला वैसे तो हर बार तू खिलौने ले जाती हैं और समय पर पैसा भी चुका देती हैं। इस बार तूने ज़्यादा उधारी की हैं, मेले से आते ही पैसा चुका देना।         कमला हंसकर कहती हैं......होओ सेठ। आज तक शिकायत का मौका नहीं दिया है.....इस बार भी नहीं दूंगी। ऐसा कहते हुए वो घर पर आती है और अपनी दोनों बेटियों के साथ मेले में जाने की तैयारी करती है।         वह अपने बीमार पति को खान

कचोरी का टुकड़ा...

      दूर से नज़र आ रही धुंधली  तस्वीर का धीरे—धीरे पास आना और जानी हुई सूरत के साथ मुस्कुरा देना...। और वो हाथों में कागज़ की एक छोटी सी 'पुड़की'  पकड़ाकर कहना कि, जा दौड़, मैं पीछे आया...।      मीठी यादोें के साथ जब गीता की नींद खुली तब उसके सामने वो तस्वीर नहीं थी जो उसने सपने में देखी थी। भला हो भी कैसे सकती थी...। येे तो बरसों पहले ही पीछे छूट गई है।          लेकिन गीता सपने की उस  धुंधली तस्वीर को खुली आंखों से महसूस करती है। ये तस्वीर उसके नाना की है जो साइकिल से चले आ रहे हैं और पास आकर उसके हाथों में वो कागज़ की 'पुड़की' देकर कहते हैं कि जा दौड़, मैं पीछे आया....।      गीता दौड़ लगाती हैं कुएं की मुंडेर तक...जहां गुलाबी ओढ़नी ओढ़े   हुए बैठी हैं उसकी नानी। गीता की फूली हुई सांस देखकर नानी कहती है, भला यूं सरपट दौड़कर आ रही हैं कहीं रपट जाती तो...।     गीता अपनी नानी के हाथ में वो कागज़ की 'पुड़की'  थमाती है और पास ही बैठ जाती है। नानी उसके सिर पर हाथ फेरती हैं और फिर दोनों खेतों की पगडंडी की ओर नज़रें गढ़ा कर देखने लगती है।        साइ​किल के सा

संक्रमण काल की 'वॉरियर'

         ना दिन की फिकर ना रात का डर। बस चिंता हैं तो सिर्फ इस बात की, कि हमारे राज्य का हर व्यक्ति स्वस्थ्य और प्रसन्न हो। बस इसी उदृदेश्य और ज़ज्बे को लेकर दिन रात अपने काम में जुटी हैं प्रदेश की आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, सहायिका, ग्राम साथिनी और आशा सहयोगिनी। पिछले चार महीने से ज़मीन स्तर पर गांव—ढ़ाणी में जाकर कोविड—19 के बीच डोर—टू—डोर जागरुकता अभियान में लगी हुई है।   इतना ही नहीं प्रशासन की ओर से कई आंगनबाड़ी वर्कर्स के पास कोरोना संक्रमण से लड़ने के प्राथमिक हथियार जैसे मास्क, सैनेटाइजर, ग्लव्ज़ और फेस शील्ड तक उपलब्ध नहीं हो रहे हैं। इसके बावजूद ये बेखौफ अपने कर्तव्य का पालन करने में डटी हुई हैं। इसी का परिणाम है कि आज आंगनबाड़ी कार्यकर्ता एवं एएनएम द्वारा चलाई जाने वाली निगरानी एवं जागरूकता मुहिमों में लगभग 39 करोड़ लोग कवर किए जा चुके हैं। ये आंकड़ा निश्चित ही सुकून देने वाला है।             लेकिन इसे पूरा करने वाली आंगनबाड़ी वर्कर्स के काम को सरकार और प्रशासन की ओर से वो मान नहीं मिल रहा है। जो एक कोरोना वॉरिसर्य को दिया जा रहा है। ऐसे में इनका मनोबल कहीं—कहीं टूट भी रहा है

सत्ता के शेर, ड्यूटी के आगे ढेर....

       पद कोई भी हो लेकिन जिसे ड्यूटी निभाना आता हैं वो फिर मंत्री—शंत्री और किसी बाबजी से नहीं डरता। लेडी कांस्टेबल सुनीता यादव ने दिखा दिया कि ड्यूटी को ज़िम्मेदारी से कैसे निभाया जाता है।          गुजरात के स्वास्थ्य मंत्री कुमार कानानी के बेटे को इस लेडी कांस्टेबल को धमकी देना वाकई भारी पड़ गया। सत्ता को जेब में लेकर हेकड़ी दिखाने वाले आज मामूली सी कांस्टेबल के कर्तव्य के आगे झूक गए है।          इस घटना ने राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में हुई उस घटना की याद को ताजा करा दिया हैं जब लॉकडाउन के दौरान एसडीएम तेजस्वी राणा ने बेगूं से विधायक राजेंद्र बिधूड़ी की कार पर चालान काट दिया था। महज़ कुछ घंटों में ही इस दबंग लेडी अफसर का जयपुर में ट्रांसफर कर दिया गया था। लेकिन राणा की निडर छवि खूब सुर्खियों में रही।           आज सालों पहले हुआ वो वाकया भी याद आता है जब पहली महिला आईपीएस किरण बेदी ने देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की कार का चालान काट दिया था।          दरअसल, ये घटना 1982 की है। उस समय किरण बेदी को दिल्ली शहर के ट्रैफिक की कमान मिली हुई थी और वो दिल्ली की ट्रैफिक कमिश्नर थीं। द

जुर्माने से बड़ी जान है 'साब'...

        'आपको याद तो होगा ​एक साल पहले 19 जुलाई  की शाम चार बजे जेडीए सर्किल का वो खौफनाक मंजर। जब तेज गति से आ रही एक कार ने लालबत्ती पर अपनी बाइक पर सवार दो सगे भाईयों पुनीत और विवेक पाराशर को टक्कर मार दी थी। जिससे दोनों हवा में उछलकर काफी दूर जा गिरे थे और दोनों की मौके पर ही मौत हो गई थी।       ऐसे पुनीत और विवेक ही नहीं... बल्कि पूरे देश में ऐसे कई ऐसे युवा, बुजुर्ग, महिला और पुरुष हैं जो सड़क पर किसी दूसरे की लापरवाही का शिकार हो जाते है और इसकी कीमत उनको अपनी जान देकर चुकानी होती हैं। हमारे राज्य और देश में कई ऐसे परिवार हैं, जिनके घरों के चिराग इन सड़क हादसों की भेंट चढ़ चुके हैं। देर से ही सही, लेकिन सरकार को सुध तो आई कि उन्होंने 1 सितंबर 2019 से लागू मोटर यान संशोधन अधिनियम 2019 के तहत जुर्माना राशि निर्धारण के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। जिससे अब 36 तरह के यातायात नियमों के उल्लंघन के मामलों में जुर्माना राशि बढ़ गई हैं।     जिसमें शराब पीकर वाहन चलाने पर 10 हजार रुपए, खतरनाक और तेज गति से वाहन चलाने पर एक हजार रुपए का जुर्माना भरना पड़ेगा। इसके अलावा मोबाइल पर बात

स्कूल आ गया 'घर' ...

      इन दिनों हर घर में एक स्कूल चल रहा है। जिसकी प्रिंसीपल भी 'मां' हैं और क्लास ​टीचर भी 'मां' ही है। लेकिन ये इतना आसान नहीं है। हमें समझना होगा उस औरत और मां की मन:स्थिति को ​जो सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक एक मशीन की तरह चल रही है। दो से तीन घंटे नॉन स्टॉप बच्चों को पढ़ाना फिर घर का सारा काम मैनेज करना आखिर कितनी क्लासेस को पूरा करेंगी ये मां?  सीबीएसई ने कक्षा 9 से 12वीं तक का सिलेबस 30 प्रतिशत घटा दिया हैं। इससे बच्चों को निश्चित ही राहत मिलेगी लेकिन कक्षा 1 से 8वीं तक की पढ़ाई में भी लचीलापन हो जिससे बच्चों और मां दोनों को राहत मिल सके। क्योंकि छोटी क्लास के बच्चों के साथ बहुत माथापच्ची करनी होती है। खासकर तब जब कि बच्चे घर में रहते हुए ही पढ़ाई कर रहे हो।                  स्कूल जाने से बच्चों का एक रुटिन था और पढ़ाई के घंटे भी तय थे लेकिन घर पर बैठकर ऑनलाइन क्लास लेने से घर की औरत का पूरा रुटिन डिस्टर्ब हो गया है। ऑनलाइन क्लासेस अधिकतर सुबह 9 बजे से 12 और 1 बजे तक लग रही है। ऐसे में मां कब इनके लिए नाश्ता बनाएं और ​कब खाना? रोज़ रोज़ बच्चों से ज़्यादा

'मां' ही तो होती है पहला गुरु....

        आज गुरु पूर्णिमा है और इस पावन पर्व पर उन सभी गुरु और जीवन को बेहतर एवं शिक्षित बनाने वालों को प्रणाम और नमन करता हैं दिल। हर व्यक्ति के जीवन का पहला गुरु 'मां' ही होती हैं। जो न सिर्फ हमें अच्छे और बुरे का फर्क बताती हैं बल्कि जीवन के हर छोटे—बड़े संघर्षो से लड़ना भी सीखाती है। वरना हम और आप एक काबिल इंसान नहीं होते।          हम जहां हैं और जैसे हैं...उसके पीछे 'मां' का प्यार, दुआएं और आशीर्वाद ही है। मां की भावनाओं का सम्मान करें क्योंकि दुनिया में सिर्फ ये ही एक रिश्ता है जो आपको सिर्फ देता हैं और बदले में आपसे कुछ नहीं मांगता। इस भावनात्मक रिश्ते को हमेशा संजोकर रखें...।         गुरु पूर्णिमा के अवसर पर राजस्थान पत्रिका में आज मेरी कहानी 'मां' की भावनाओं का टोटल इन्वेस्टमेंट प्रकाशित है। इसका लिंक भी शेयर कर रही हूं।  https://www.kahanikakona.com/2020/06/blog-post_25.html     

धन्यवाद 'डॉक साब'...

     यूं तो डॉक्टर्स को जितना धन्यवाद दें उतना कम हैं लेकिन आज इनके काम को समग्र रुप से धन्यवाद देने का दिन है। इसीलिए इस दिन को 'डॉक्टर्स डे' के रुप में मनाया जा रहा है। जिन हालातों से पिछले दिनों हम सभी ग़ुजर कर आए हैं उसमें जीवन को संभालने और सुरक्षित रखने में डॉक्टर्स ने बहुत अहम भूमिका निभाई है।  लॉकडाउन में 'कोरोना वारियर्स' के तौर पर जिस तरह से डॉक्टर्स ने अपनी ड्यूटी को अंजाम दिया है और अभी तक उसे पूरा करने में जुटे हैं। उसके लिए हम जितना भी लिखें और कहें वो कम हैं आज। ऊपर यदि भगवान है तो नीचे धरती के भगवान ये 'डॉक्टर' ही है।            हममें से कईयों के जीवन में ऐसा पल आया होगा जब हमारा अपना कोई या फिर हम ख़ुद जीवन और मृत्यु के संघर्ष के बीच में रहे होंगे। तब हमारी प्रार्थनाओं में ज़रुर ईश्वर था लेकिन ज़िदगी बचाने में ये डॉक्टर ही लगे थे। डॉक्टरी पेशा इसीलिए बाकी प्रोफेशन से अलग है। ये सिर्फ नौकरी नहीं है बल्कि एक ऐसी सेवा हैं जो बहुत मूल्यवान है।            आज नमन हैं सभी डॉक्टर्स और चिकित्सा पेशे से जुड़े लोगों को जो इस सेवा कार्य में जुटे हैं..