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Showing posts from August, 2020

खाली रह गया 'खल्या'..

   हर रोज़ फ़रदू यही सोचता कि आज वो अपने खल्ये में कुछ पैसा तो बचाएगा ही। लेकिन रात को जब घर आता तो उसका खल्या खाली ही रह जाता। लेकिन वो उम्मीद नहीं छोड़ता...। फिर सुबह होते ही सब्ज़ियों के साथ चेहरे पर ताज़गी लिए पहुंच जाता चौबट्टा...।        फ़रदू की व्यवहार कुशलता से न सिर्फ चौबट्टा में बैठने वाले लोग ख़ुश होते बल्कि उसके पास आने वाला हर व्यक्ति उसकी खुश मिज़ाजी का कायल था। तभी तो हर रोज़ बाकी लोगों से ज़्यादा उसकी सब्ज़ियां बिकती थी। यूं तो फ़रदू बड़ा ज़िंदादिल और मन मौजी था। किसी बात को दिल पर लगाकर रुआंसा नहीं होता। लेकिन कई बार वह अकेलापन ज़रुर महसूस करता।           बीते तीन महीने से वह अपने खल्ये में आए पैसों को बचाने में लगा था। इसकी वजह थी नेकी।         फ़रदू को नेकी से बहुत प्रेम था। वह सोचता था कि नेकी उसके जीवन में आएगी तो उसका भी अपना कहने वाला कोई होगा और उसका अकेलापन भी दूर हो जाएगा।      लेकिन नेकी चाहती थी कि फ़रदू कुछ पैसा जमा करके ख़ुद का सब्जी का ठेला लगाए। नेकी को फ़रदू का चौबट्टे में नीम के पेड़ के नीचे बैठकर सब्जी बेचना पसंद नहीं था।       

'समानता' का शोर क्यूं...?

      आज महिला समानता दिवस है.... क्यूं हम एक स्वर में इस दिन चिल्लाने लगते हैं कि महिलाओं को  'समानता दो'..'समानता दो'...। क्यूं ये एक शब्द इस दिन मुखर हो उठता है।            मैं नहीं मानती कि समानता का यूं शोर होना ज़रुरी है। शुरुआत तो हर रोज़ ही होनी चाहिए। वो भी घर से। आज एक सवाल हर औरत का हैं जो इस शोर को तो सुन रही हैं लेकिन इस शोर में उसके भीतर का शोर किसी को सुनाई नहीं देता।        कितने लोग और परिवार हैं जो बेटी, बहू, पत्नी और मां को 'मन की आज़ादी' दे पाते है। कितने हैं ऐसे जो इस विषय पर भी संवेदनशील होकर सोचते है। शायद मुट्ठी भर लोग।      एक औरत को समानता देने की शुरुआत तो घर ही से होगी। फिर समाज और फिर देश तक समानता का शोर हो...।      जरा सोचकर देखिए क्या  हम  अपने घर की औरतों को मन से कुछ करने की आज़ादी देते हैं?  क्या वो भी हमारी तरह सब कुछ मन का कर पाती हैं?  नहीं...। सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक वो सिर्फ घर और परिवार का ही सोचकर रह जाती है। रोज़ाना वह ख़ुद अपने मन की आज़ादी के साथ संघर्ष करती है। जो ख़ुद अपने सोच पाने का संघर्ष कर रही हो

आख़री ख़त प्यार के नाम...

         आख़री—आख़िरी             न जाने वक़्त कब यूं ही गुज़रता चला गया। कितना सुकून था उस पल में जब बेफिक्र सुबह और शाम थी और चांदनी रातों के तले नींद। भर पेट खाना नहीं था और नहीं पहनने को मनपसंद कपड़े...। फिर भी ​माथे पर चिंता की लकीरें नहीं थी। और आज क्या कुछ नहीं हैं पास। गाड़ी, बंगला, नौकर—चाकर फिर भी दिल के भीतर खालीपन है। काश! राजीव उस दिन ज़िद नहीं करता...लेकिन अब क्या फायदा ये सब सोचकर। फिर भी इसी ख़्याल को ज़ेहन में लिए बैठी हैं नीलू। आज बारिश की बूंदों ने उसके चेहरे पर गिरकर उन बीते दिनों की धुंध को साफ़ कर दिया हैं। नीलू इस धुंध के पीछे जाकर राजीव को ढुंढती हैं।    उस दिन भी ऐसी ही तेज मूसलाधार बारिश हो रही थी। राजीव और नीलू कॉलेज कैंपस में एक छाते के नीचे खड़े होकर अपने करियर और जीवन के संघर्षो पर गहरी चिंता में थे।     राजीव कह रहा था नीलू हमारे पास इतने रुपए नहीं कि हम दोनों एमबीए की पढ़ाई कर सके। और फिर हम दोनों में कोई अंतर नहीं हैं। अगर डिग्री तुम्हें मिलती हैं तो भी हम दोनों का भविष्य संवर जाएगा। मैं कोई और नौकरी कर लूंगा। नीलू कहती हैं नहीं राजीव। हमने तय किय

74 साल का 'युवा भारत'

यूं तो वक्त की गाड़ी पर सवार होकर आज़ादी की उम्र बढ़ रही हैं लेकिन ये व्यक्ति की उम्र की तरह बूढ़ी नहीं हुई हैं। बल्कि इसके यौवन में बढ़ोतरी होती जा रही हैं।  इसका आंकलन देश के सर्वांगीण विकास के माध्यम से कर सकते हैं।    जैसे पहले मनोरजंन का एक मात्र साधन था— रेडियो। फिर आया रिकॉर्डर, ग्रामोफोन, टीवी, रिकार्डॅर, टेप, म्यूजिक सिस्टम। और अब हाथ में मोबाइल के रुप में पूरी दुनिया... यानि दुनिया मुठ्ठी में आ गई। सबकुछ एक मोबाइल में ...चाहे वो फोन करने से लेकर किसी भी तरह का गाना सुनना हो, देखना हो, गूगल सर्चिंग से लेकर सोशल मीडिया के तमाम प्लेटफार्म...। पहले दूसरे देश या परदेश में बैठे अपने सगे संबंधियों से बात करने के लिए ट्रंककाल बुक करवाना पड़ता था, लेकिन आज बात करने के लिए कई साधन हैं।      इस तरह डाक विभाग में बदलाव, अख़बार को पढ़ने का तरीका, बस, ट्रेन और हवाई जहाज का सफर ....। पहले रील कैमरा, अब डिजिटल कैमरा, मोबाइल कैमरा, ड्रोन कैमरा । पैमेंट का पेटर्न पूरा डिजिटल हो गया, अब आपको जेब में एक रुपया रखने की जरुरत नहीं। यानि की पर्स रखने की मजबूरी से आजादी। सरकारी तंत्र का सारा काम अब ऑ

ज़िंदगी का फ़लसफ़ा

     सोमित बाबू बंगाली भाषा के लेखक है। लेकिन हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी और फ़ारसी में भी उनकी अच्छी खासी पकड़ है। वे एक ख़्यातनाम लेखक है। उनकी ऐसी कोई क़िताब नहीं जोे लोगों के बीच चर्चित ना हुई हो। लेकिन सोमित बाबू को इसे लेकर जरा भी अं​हकार नहीं है।       वे हमेशा एक बेहतरीन और नए विषय की तलाश में रहते हैं।  ऐसा विषय जिसे लोग पहली बार पढ़े और सुने। यूं तो वे सामाजिक परिस्थितियों की उलझनों और उधेड़बुन में गुज़र रही ज़िदगी के संघर्षो पर अधिक लिखते है। लेकिन सम—सामयिक विषयों पर भी उनके लेख आए दिन पत्र—पत्रिकाओं में छपते रहते है। उन दिनों देश में रोजगार नहीं था। लोगों को एक वक़्त का भोजन भी मुश्किलों से नसीब हो रहा था। जैसे—तैसे मजदूरी करके लोग अपना व अपने परिवार का पेट पाल रहे थे। सोमित बाबू इन हालातों को भांप रहे थे।     उन्होंने मजदूरों की मार्मिक दशा को अपने लेख में लिखा। ये लेख इतना संवेदनशील और मार्मिक था जिसने सरकार को भी गहरे रुप से प्रभावित किया। सरकारी नुमाइंदों ने सोमित बाबू को बुलाया और उन्हें पुरस्कार देने की घोषणा की।     सोमित बाबू को अपने नाम से ज़्यादा व्यवस्थाओं में सुधार