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Showing posts from September, 2020

'भगत बा' की ट्रिंग—ट्रिंग

          बात उन दिनों ​की हैं जब एक छोटे से गांव कृष्णपुर में बड़े जमींदारों, ठाकुरों और पाटीदारों को छोड़कर आम लोगों के पास रहने के लिए ईंट, गारा और पत्थर के मकान हुआ करते ​थे। एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचने के लिए एकमात्र साधन साइकिल ही होती थी वो भी सभी के पास नहीं थी। हां कुछेक बड़े किसानों के पास ख़ुद की बेलगाड़ी ज़रुर थी जो अनाज व चारा लाने ले जाने के काम के अलावा कभी—कभार हारी—बीमारी में भी गांव के लोगों को अस्पताल पहुंचाने के काम आया करती थी। लोग हर सुख और दु:ख में एक—दूसरे के बेहद क़रीब थे।       कृष्णपुर गांव के लोग सादा जीवन उच्च विचार की सोच वाले थे। जो मिला वो खा लिया जब नींद आई तब  बांस से बनीं चटाई बिछाकर सो गए। सोने के लिए गद्देदार  बिछौने की कोई बड़ी चाहत न थी। जिसके पास अच्छा बिछौना था उसे भी इसे लेकर कोई घमंड या अकड़ नहीं थी।      मनोरंजन के नाम पर गांव में सालभर में आठ से दस बार ऐसे आयोजन भी होते थे जिसे लेकर लोगों में बेहद उत्साह व आकर्षण रहता। गांव के सबसे बड़े चबूतरे पर रामलीला का मंचन होता था। गांव में चार पहियों की गाड़ी जब भी आती तो उसका भौंपू सुनकर ही लो

असल 'ठेकेदारी' करके तो देखो..

      बेटा होगा या बेटी..? इसकी तसल्ली करने के लिए पति ने  गर्भवती पत्नी के पेट को बड़ी ही बेरहमी से चीर डाला। वो भी एक पंडित के कहने पर।      उत्तर प्रदेश के बदायूं में हुई यह घटना वाकई सन्न कर देने वाली है।     ऐसा करते हुए क्या एक बार भी उसके हाथ नहीं कांपे होंगे? उसका दिल नहीं दहला होगा? ये सवाल हैं उस समाज का जिस समाज के हम हिस्से हैं।         फिर मौन क्यूं हैं अब समाज के वे ठेकेदार जो पिछले दिनों राजस्थान के चित्तौड़गढ़ के डूंगला में एक युवक—युवती को प्रेमी समझकर बिजली के खंभे से बांधकर बेरहमी से पीट रहे थे। आखिर क्यूं? ये होते कौन हैं जो बेमतलब किसी की ज़िंदगी पर अधिकार जताने चले आते हैं और मनमर्जी से न्याय देने लगते हैं।       अगर इतनी ही ठेकेदारी का शौक रखते हैं ऐसे लोग तो, अब क्यूं नहीं पीटते हैं उस जाहिल—गंवार पति को जिसने रिश्तों पर हंसिया चलाया। अपनों का खून करने वाले हाथों को क्यूं नहीं काट देता हैं ये समाज...? सुनकर हैरानी है कि आज भी बेटा पैदा करने की सोच पर बुरी मानसिकता हावी हैं। बेटा पैदा हो अच्छी बात हैं लेकिन बेटा न देने वाली औरत का यूं तिरस्कार किया जाना

कब बोलेंगे 'हम' सब 'हिन्दी'...

        'हिन्दी दिवस' एक जश्न हैं हमारी मातृभाषा का। ये जश्न हैं उस भाषा का जिसमें हमने अपनी 'मां' के प्रति अपने अहसास को शब्द देना सीखा हैं। लेकिन आज भी यह उस सौ फीसदी आंकड़े से अछूती हैं जब हम ये कह सके कि देश में अब सारे काम हिन्दी में ही हो रहे है। यानि लिखना, पढ़ना, बोलना, सोचना और समझना सभी कुछ।            यदि आंकड़ों पर गौर करें तो वर्तमान में भारत में 43.63 फीसदी लोग ही हिंदी भाषा बोलते हैं। निश्चित ही देश में हिन्दी बोलने वालों की संख्या पिछले कई सालों से बढ़ रही है। लेकिन मातृभाषा होने के बावजूद भी देश में आधे से ज़्यादा लोग हिन्दी नहीं बोलते हैं। इस दृष्टि से हिंदी के सामने अब भी बड़ी चुनौती है और अब भी हम खुद अपने ही देश में हिंदी बोलने से पिछड़े हुए है।    देश में पले बड़े लोग ही जब ये कहते हैं कि मेरी हिंदी कमज़ोर हैं तो इसे फैशन के तौर पर लिया जाता है। लेकिन ये ही लोग ये कहने से बचते हैं कि मेरी अंग्रेजी कमज़ोर हैं। क्योंकि ऐसा कहने से उनका मज़ाक बन सकता हैं। ये बात हिन्दी के प्रति आम नज़रिए और सोच को स्पष्ट कर देती है।  क्यूं बचते हैं लोग

'रिया' नहीं 'नौकरियां' चाहिए...

              किसी मुद्दे पर शोर उठना वाज़िब है। उठना भी चाहिए लेकिन इन दिनों सुबह—दोपहर—शाम और रात तक जो शोर सुनाई दे रहा है। उसने न सिर्फ लोगों के कान पका दिए हैं बल्कि कईयों की मन:स्थिति को भी बिगाड़ दिया है।  निश्चित ही सुशांत सिंह राजपूत का मामला देश में गरम है। लोगों के दिलों में एक आग लगी हुई है। अब भी एक ही सवाल ​हरेक की जुबां पर बाकी हैं...क्या सुशांत ने वाकई सुसाइड की है या फिर उसका मर्डर हुआ है? इस सवाल का जवाब तो फ़िलहाल नहीं मिला हैं। उल्टा कई और सवाल खड़े होते जा रहे हैं।       लेकिन एक आम आदमी जो कोविड—19 में जी रहा हैं। उसके सामने अब भी रोजी—रोटी और नौकरी का ही सवाल शेष खड़ा है।  युवाओं को 'रिया' नहीं 'नौकरियां' चाहिए...देश का युवा परेशान हो रहा हैं। घर चलाने के लिए पैसा नहीं हैंं। काम के दरवाज़े बंद हैं..।  किसान को भी 'रिया' नहीं 'यूरिया' चाहिए..। देश का किसान मर रहा हैं ...। ऐसा नहीं कि मीडिया ऐसे विषयों को तरज़ीह नहीं देता है। समय—समय पर इन समस्याओं को भी उठाता रहा हैं लेकिन इस वक्त देश के मुश्किल हालातों में ये भी गर