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Showing posts from November, 2020

'सित्या' का डर...

        फटी हुई मोजड़ी..फटा कुर्ता और चिन्दी हाल पगड़ी पहने हुए पत्थर की सड़कों पर लाठी मारते हुए जब वो गांव की गलियों से गुज़रता था तो अजीब सा डर लगता था। मानो वह सिर्फ डराने को ही निकला हो।     जब भी वह सामने आ जाता तो उसे देखकर आवाज़ बंद हो जाती..डक्की सी बंध जाती। वह जोर—जोर से हंसता रहता और अपने कांधे से फटी हुई पोटली को उतारकर उसमें कुछ डालने का इशारा करता। ये दृश्य किसी हॉरर मूवी से कम न था।      ये दृश्य सुधा के जीवन में आज भी गहराई के साथ जुड़ा हुआ हैं। आज भरे बाज़ार में 'सित्या' कहकर किसी ने आवाज़ लगाई। बरसो बाद ये नाम सुधा के कानों में पड़ा था। सुधा ने फौरन पीछे पलटकर देखा तो सित्या एक बच्चा था और उसे आवाज़ लगाने वाला उसका कोई जानकार।      सुधा ने राहत की सांस ली और खरीदारी करके अपने घर चली आई। लेकिन 'सित्या' और ​उसका ख़्याल पूरे रास्ते भर उसके साथ चला। घर आते ही उसने एक ग्लास पानी पिया और अपने अहाते में आकर बैठ गई। और सोचने  लगी अतीत के उन पलों को जिसमें सित्या का डर था।     सुधा को याद आता हैं अपना वो बचपन जिसमें उसकी सहेलियां दुर्गा, गायत्री और ज्योति उसक

वर्चुअल दुनिया में महिलाएं असुरक्षित

सोशल मीडिया पर गुंडागर्दी .... यूं तो महिलाओं के साथ लगातार हिंसा, अत्याचार शोषण और दरिंदगी जैसे मामले बढ़ रहे हैं। आए दिन ऐसी कई घटनाएं सामने आ रही हैं जो महिलाओं की सुरक्षा को लेकर बेहद विचलित और चिंतित कर रही हैं। अपराधी कोे पकड़ने से लेकर उसे सजा दिलाने तक के कई मामलों में हमारी व्यवस्थाएं कभी पंगु तो कभी लड़खड़ाती हुई दिख रही हैं।        ऐसे में इस व्यवस्था के सामने अब एक और नए जमाने का नया अपराध 'ऑनलाइन हिंसा' और 'एब्यूज' आ खड़ा हुआ हैं। और इस अपराध को करने वाला अपराधी 'वर्चुअल' हैं जो दिखाई नहीं देता हैं। तब सवाल ये है कि हमारा सिस्टम इस अपराध से लड़ने के लिए कितना तैयार हैं? क्या वो इस अपराध को रोकने और न दिखने वाले अपराधी को पकड़ने के लिए मुश्तैद हैं? क्या सिस्टम के पास भी ऐसे वर्चुअल हथियार हैं जिससे वो पीड़िता की रक्षा कर सकें? शायद नहीं...।      इस अपराध की बढ़ रही भयावयता को हाल ही में हुए एक सर्वे के बाद बेहतर रुप से समझा जा सकता हैं।  जिसके अनुसार दुनियाभर के 22 देशों में लड़कियां और महिलाएं ऑनलाइन उत्पीड़न और अपशब्द की मार झेल रही हैं।      ब्रि

बेबसी की 'लकीरें'...

    हरि और उसकी पत्नी अपने चार साल के बेटे के साथ पुश्तैनी गांव में रह रहे थे। लेकिन गांव में रोजगार कुछ था नहीं। जैसे तैसे छोटा—मोटा काम करके गुजर बसर हो रही थी। हरि और उसके परिवार को कई बार एक वक़्त का भोजन भी मुश्किल से ही मिल पाता। लेकिन बिना पैसो के आख़िर कब तक हरि अपने परिवार को पालता।      धीरे—धीरे समय बीत रहा था और हरि की चिंता भी बढ़ रही थी। उसे और उसकी पत्नी को अपने बेटे मुन्ने की चिंता अधिक सता रही थी। उस मासूम को कब तक भरपेट भोजन नहीं देते।  एक दिन गांव के ही लेखू ने हरि को बताया कि शहर में बिना पढ़े लिखे लोगों के लिए भी काम होता हैं। वो भी पैसा कमाने के लिए शहर जा रहा हैं। उसे वहां पर वॉचमैन की नौकरी मिल गई हैं। हरि ने उसकी बात सुनी तो उसे भी विश्वास जागा और उसने भी लेखू के साथ शहर जाने का फैसला कर लिया।     घर आकर हरि ने अपनी पत्नी से शहर जाने की बात कही। लेकिन उसकी पत्नी इस बात के लिए राज़ी नहीं हुई। हरि ने उसे बेहद तसल्ली से समझाया कि बिना पैसों के कब तक वो यूं ही गांव में फिरता रहेगा। यहां पर ऐसा कोई काम नहीं जिससे रोज़ाना उसकी कमाई हो सके। जिन लोगों के पास खेती हैं,