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Showing posts from December, 2020

2021 की दस्तक जो हैं....

 अलविदा—2020 दोष तुम्हारा नहीं था। दोषी तो वो परिस्थितियां थी जब 'कोरोना' एक 'काल' बनकर आया था। तुम तो महज़ एक अंकों का क्रम हो। आज जैसे तुम 20 हो, वो कल वैसे ही 21 होगा...।    लेकिन ये भी सच हैं कि जो आया हैं वो जाएगा। बस इसीलिए तुम जा रहे हो..। तुमसे कोई गिला—शिकवा नहीं हैं...। वो यादें ही कड़वी थी जब कोरोना ने कई ज़िंदगियों को हमसे छिन लिया...वो हालात ही मजबूर थे जब भूख से ज़िंदगियां तड़प रही ​थी...वो यादें ही बुरी थी जिसने हाथों से काम छिनकर नंगे पैर चलने को मजबूर किया था।     तुमसे कैसी शिकायत...। शिकायत तो उन परिस्थितियों से हमेशा रहेगी जब चाहकर भी किसी की मदद नहीं कर सके और ना ही अपने लिए किसी को बुला सके..। बस चार दिवारी में लॉक होकर अपनी खिड़कियों से झांककर कोरोना का तांडव देखते रहे। चारों तरह सन्नाटा ज़रुर पसरा हुआ था लेकिन भीतर बहुत शोर था...। मन बैचेन था और दिल अपनों से मिलने के लिए तड़प रहा था...।      अफसोस ये रहेगा कि तुम्हारें क्रम में बनीं यादें कोरोना की गवाह रही हैं....। शायद प्र​कृति का यही नियम हैं। तुम न होते तो शायद कोई और क्रम होता...। कोराना ने

अन्नदाता की हांफती सांसों की कीमत क्या...?

      बात छोटी—सी हैं पर सालों बाद समझ आई है। कहते हैं ना कि जब तक कोई टीस ख़ुद के दिल पर ना लगे तब तक उसका दर्द महसूस नहीं होता। बरसों बाद, मैं अपने नाना के उस दर्द को समझ पा रही हूं जब वे अनाज की मंडी से मुंह लटकाए हुए आते थे...।      उस वक़्त मेरी सोच भी उम्र की तरह मासूम थी। शायद इसीलिए मैं ये नहीं समझ सकी, आख़िर खुशी—खुशी अनाज की मंडी में अपना धान लेकर जाने वाले मेरे नाना शाम को उदास चेहरे के साथ क्यूं लौटते थे...?    क्यूं वे मंडी से आने के बाद बरामदे में अपने माथे पर हाथ रखकर बैठ जाते थे...? क्यूं वे मेरी किसी बात का जवाब पूरे उत्साह के साथ नहीं दे पाते थे...?      उनका उदास चेहरा देखकर नानी शायद समझ जाती थी इसीलिए वे भी बहुत दु:खी होती। मंडी से आने के बाद जब वो नाना से पूछती कि 'कितनी बोली लगी हैं'...? धान की कीमत वसूल हो पाई या नहीं...?   उसके जवाब में नाना कहते कि साल भर की मेहनत पर पानी फिर गया 'नंदा'...।    ये सुनकर नानी उनके कांधे पर हाथ रखती और उन्हें दिलासा देती। और फिर अपनी आंखों में आंसू लिए हुए उन लोगों को बुरी तरह से कोसती थी जो अनाज की मंडी में अच्छे

मीरा का ‘अधूरा’ प्रेम...पार्ट-2

         देव बिना रुके बोलता रहा। उसकी बातें सुनने के बाद मैंने उससे पूछा कि , तो क्या देव वो पत्र मीरा ने नहीं पढ़ा था? हैं ईश्वर...! उस रात मुझसे कितनी बड़ी भूल हो गई। मैंने मीरा की बातों पर क्यूं भरोसा नहीं किया...?   ओह! मीरा मुझे माफ कर दो। ‘वह चिल्लाती रही, प्रेम मेरा विश्वास करो...मैं इस पत्र के बारे में कुछ नहीं जानती...।      काश! उस दिन उस वक़्त मीरा की बातों पर भरोसा किया होता...। देव की बातें सुनने के बाद मैंने उसे बताया कि उस रात तुम्हारें जानें के बाद मैं,  मीरा के घर पहुंचा था। मीरा ने बताया था कि तुम उससे मिलकर कुछ ही देर पहले निकलें हो। मैंने उससे कहा कि ठीक हैं तुम एक ग्लास पानी ले आओ। वह पानी लेने गई। मैंने इधर-उधर देखा और फिर मेज़ पर रखी क़िताब को उठाया। मैंने ऐसे ही उसके पन्ने पलटना शुरु किए। तभी उसके अंदर से एक कागज़ गिरा। ये तुम्हारा पत्र था।     इसकी पहली पंक्ति में लिखा था कि प्लीज पढ़ने के बाद नाराज़ नहीं होना...। ये पढ़कर मैं खु़द को रोक नहीं पाया और पत्र को पढ़ने लगा।      पत्र की शुरुआत ‘डियर मीरा’ से हुई। यह पढ़ते ही मेरी छाती फट गई। मानों किसी ने गहरा वार किया हो.

मीरा का 'अधूरा' प्रेम...

पार्ट—1       आज भी यह नाम मुझे बैचेन कर देता हैं। होंठ कपकंपाने लगते हैं, जीभ लड़खड़ाने लगती हैं..पूरा शरीर सफेद पड़ने लगता हैं मानो शरीर का सारा खून सुख गया हो...आंखों से आंसू नहीं बल्कि आग निकल रही हो...।    पांच वर्ष बीत गए। किसी काम के सिलसिले में मुझे एक बार फिर इस शहर में आना पड़ा।    इस शहर को मैं कैसे भूल सकता हूं..। यहां मुझे वो मिला जिसकी मुझे कभी कोई ख्वाहिश ना थी। वह मेरे जीवन का पहला प्यार थी। जिसे मैंने पूरे दिल से स्वीकारा था...।     कॉलेज का पहला दिन, जब मीरा को कैंटीन में चाय पीते हुए देखा था। लंबा कद, चेहरा भरा हुआ, छोटे—छोटे बाल और ठहाके लगाते हुए प्यारी सी मुस्कान। कैसे भूल सकता हूं।     कैंटीन में पहली मुलाकात 'एक्सक्यूज़मी' कहते हुए हुई थी। तब उसने पलटकर जवाब दिया था। हां ज़रुर..। उससे जब भी कोई अंग्रेजी में बात करता वह उसका जवाब हिंदी में ही देती थी। उसकी बातें हमेशा साधारण होती थी लेकिन उसे कहने का अंदाज बेहद  असाधारण होता था..।     लोगों को आकर्षित करने की उसमें अद्भूत कला थी। ऐसा कोई दोस्त या परिचित नहीं था जो उसकी बातों को सुनकर प्रभावित नहीं होता।