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Showing posts from January, 2021

गणतंत्र का 'काला' दिन..

        आज जश्न है 72वें गणतंत्र का...। आज उत्सव है हमारे अपने सविंधान का ...। आज दिन हैं इसे संजोकर रखने का...। ये नया भारत हैं जो झुकेगा नहीं बल्कि झुका देगा...। इसके लिए आज मरने की नहीं बल्कि जीने की ज़रुरत हैं।      ये आज़ादी इतनी सस्ती तो नहीं मिली हैं हमें कि इसे यूं ही धुआं फूंककर उड़ा दे...इसे मटरगस्ती में उजाड़ दें या फिर एक—दूसरे के सामने तलवारें लेकर खड़े हो जाएं....।     इस देश की आन—बान—शान को बचाने की ख़ातिर मर मिटे रणबांकुरों को क्या ख़बर थी कि उनके लहू का कर्ज़ ओछी चाल बाजियों से उतारा जाएगा...। वो भी आज गणतंत्र दिवस के मौके पर...।  उन्हें क्या मालूम था कि देश के भीतर अन्न ऊँपजाने वाले हाथ ही आज सड़कों पर यूं तलवारें लहराएंगे...। देश की शान 'तिरंगा' यूं आज अपनों के ही हाथों अपमानित होगा...।       आज पूरे देश ने कोरोना महामारी के बीच गणतंत्र दिवस के जश्न की बे​हद भव्य तस्वीरों को देखा और सुखद अनुभव भी महसूस किया। वहीं दूसरी ओर आज किसानों द्वारा एक ऐसा 'काला अध्याय' भी लिखा गया जो इतिहास में लोकतंत्र के नाम पर हमेशा 'काला धब्बा'   बनकर दिखाई देगा..

सिट्टी—बिट्टी गुल

      सुना है कि सरहद के उस पार दुश्मन रहता हैं। वह हमारी तरह नहीं दिखता...बल्कि जल्लाद हैं। तो क्या दुश्मन के हाथ—पैर नहीं...सर और धड़ नहीं...। क्या उसकी आंखें..नाक, कान और सर पर बाल नहीं हैं...? तो फिर वह दिखता कैसा हैं...? चौपाल पर बीड़ी का धुंआ उड़ाते हुए छोरे—छपाटों की एक टुकड़ी जमा हुए बैठी हैं। भरी दोपहरी का वक़्त हैं। तपिश में राहत की छांव दे रहा हैं गांव का सबसे बूढ़ा नीम का पेड़...।      छोरों की मंडली अकसर गांव की इसी चौपाल पर बैठकर दुनिया जहान की बातें करती हैं। आज चौपाल पर मुंह पर गमछा डाले हुए फौजी बाबा भी इसी नीम के पेड़ के नीचे सुस्ता रहे हैं। यूं तो इन छोरों की इतनी औक़ात न थी कि ये फौजी बाबा के सामने सरहद पार के दुश्मन की बातें करें...। लेकिन मुंह ढका होने की वज़ह से किसी को पता ही नहीं चला कि फौजी बाबा यहीं हैं।       इसी बीच किसी ने फुसफुसियाते हुए कहा कि, अरे फौजी बाबा तो यहीं सुस्ता रहे हैं...। जरा धीरे बोलो...। तभी सबकी सिट्टी—बिट्टी गुल हुई..। फिर भी किसी ने बीच में धीरे से प्रस्ताव रख ही दिया।  अच्छा हुआ आज फौजी बाबा भी यहीं हैं...।  इन्हीं से सुनते हैं...सरहद

क्यूं बचें— 'हिन्दी' भाषा है हमारी...

   बड़ा गंदा लगता हैं ये सुनकर जब लोग कहते हैं कि 'क्यूं अच्छे भले काम की 'हिंदी' कर रहे हो'...'क्या किया तुने मेरी हिंदी करा दी'...'अबे क्यूं इज्ज़त की हिन्दी करने के पीछे पड़ा हुआ हैं...।      बेहद शर्मशार कर देते हैं ये वाक्य। आज चूंकि 'विश्व हिन्दी दिवस' हैं। ऐसे में हिन्दी पर बात होना स्वाभाविक हैं। लेकिन सिर्फ 'हिन्दी दिवस' पर ही हिन्दी की बात हो ये बात ठीक नहीं लगती।      हिन्दी को 'हीन' भावना से देखने वालों के लिए एक बार इस पर विचार करने की भी ज़रुरत हैं कि वे जिस भाषा में पले बड़े हैं। जिस भाषा संस्कृति में वे अब तक जीते आए हैं फिर क्यूं वे इसे ​कमतर मानते हुए बुरी नज़रों से देखते हैं।    दूसरी भाषा का ज्ञान होना बेहद अच्छी बात हैं लेकिन दूसरी भाषा के फेर में अपनी मातृभाषा को भूला देना ठीक नहीं। ये सुनकर भी बड़ा बुरा लगता हैं कि कुछ लोग ये तक कहने से ज़रा भी नहीं हिचकिचाते कि, उनकी हिन्दी कमज़ोर हैं...। अब भला ये क्या बात हुई।     ऐसा नहीं कि हिन्दी भाषा को एकदम हिन्दी में उच्चारित करके लिखा या बोला जाए। क्यूंकि ये भी पूरी त

स्वदेशी खेल...राह मुश्किल

        हाल ही में केंद्रीय खेल मंत्रालय ने 'खेलों इंडिया यूथ गेम्स—2021' में चार स्वदेशी खेलों गतका, कलारीपयट्टू, थांग—ता और मलखम्ब को शामिल किया हैं। कोरोनाकाल के बीच सुखद अहसास का अनुभव कराती हुई ये ख़बर वाकई खेल जगत और खिलाड़ियों के लिए एक सकारात्मक और दूरदर्शी फैसला हैं।      हमारी भारतीय संस्कृति हमेशा से ही समृद्ध और संपन्न रही हैं। चाहे वो हमारे वैदिक संस्कारों की बात हो या फिर खान—पान, वेशभूषा, रहन—सहन और पांरपरिक खेलों की। ये ही असल में हमारी पहचान भी हैं।      ऐसे में स्वदेशी खेलों को आगे बढ़ाने से ना​ सिर्फ 'पारंपरिक खेलोें' को अंतरराष्ट्रीय खेल मंचों पर पहचान मिलेगी बल्कि देश के गांव—कस्बों में रहने वाले हजारों लाखों युवाओं को भी आगे बढ़ने का मौका मिल सकेगा।      हमारे गांवों की प्रतिभाएं हमारी संस्कृति और पंरपरा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ सकेंगी। क्योंकि हमारे ये ही पारंपरिक खेल विभिन्न भारतीय राज्यों की सांस्कृतिक और पारंपरिक पृष्ठभूमि को भी दिखाते हैं।       यदि हम अपने पारंपरिक खेलों की बात करें तो उसमें ना सिर्फ जीवन जीने