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Showing posts from February, 2021

सोशल मीडिया से 'ऑफलाइन' का वक़्त तो नहीं....?

  पिछले दिनों पूरी देश—दुनिया ने ट्विटर और भारत सरकार के विवाद का तमाशा देखा है। ये बेहद ही शर्म की बात हैं कि एक विदेशी टेक्नोलॉजी कंपनी ट्विटर ने देश के एक संवैधानिक आदेश को मानने से इंकार कर दिया था। इतना ही नहीं कंपनी ने खुले रुप से देश के कानून व नियमों तक को चुनौती दे डाली कि जिन अकाउंट्स को सरकार ने बंद करने को कहा हैं वे भारतीय कानूनों के अनुरुप हैं। और कंपनी ने इसे 'अभिव्यक्ति की आज़ादी' के दायरे में पाया हैं। फोटो—सिद्धी     अब ऐसा ही एक और विवाद ऑस्ट्रेलिया और फेसबुक के बीच सामने आया हैं। ऑस्ट्रेलिया सरकार की तो ये तक नौबत आन पड़ी कि फेसबुक का सामना करने के लिए उसने भारत से मदद मांगी हैं। इतना ही नहीं ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन ने फेसबुक के रवैए के ख़िलाफ दुनिया के नेताओं का समर्थन जुटाने पर भी बात की हैं।   लेकिन 'लॉजिकली' अजीब बात लगती है ये। अब इसे इत्तेफ़ाक कहे या सोची समझी साज़िश। 'ट्विटर' और 'फेसबुक' दोनों ही को इन सरकारों के 'कायदे—कानूनों' से दिक्कत हैं। दोनों ने ही सरकारों के ख़िलाफ जाकर अपनी मर्जी चलाते हुए स्वय

पुजारी की 'बीड़ी'

      ये कहानी है मिहिरपुर के चंदूबाबा की। गांव की एक छोटी—सी मंदरी के पुजारी थे वे। पूरे गांव से वे बड़ा मान—सम्मान पाते थे। उनके पास गर कोई घड़ी भर भी ठहर जाता तो फिर उसका मन जानें का नहीं करता। उनकी बातें ही कुछ ऐसी होती थी जिसे सुनने की चाह बस होती ही चली जाती..।      एक पुजारी होने के नाते उनका कामकाज प्रभु श्री की सेवा करना और इससे जुड़े नित्यकर्म करना ही था। सुबह—शाम वे स्वयं ही   मंदरी   का कचरा—बुहारा करते। पौधों को पानी सीचतें। भगवान का स्नान—अभिषेक व पूजा करते...यहां तक कि भोग के लिए भी वे स्वयं ही प्रसादी भी बनाते थे। हां, गांव  ही से कोई भोग बनाकर ले आए तब वे मना भी नहीं करते...। उसे बड़ी ही सहजता से स्वीकार भी कर लेते...।      लेकिन गांव के कुछ बड़े घरानों और ऊंची जात के लोगों को ज़रुर इस बात से परेशानी थी। वे लोग चंदूबाबा को ऐसा नहीं करने की सलाह देते रहते...। लेकिन हर बार वे यही कहते कि भगवान तो भक्ति के भूखे हैं, उन्हें इससे फ़र्क नहीं पड़ता कि भोग किस जात के घर से बनकर आया हैं।     उनकी यह बात ऊंचा—नीचा सोचने वालों की समझ में उस समय तक तो आ जाती लेकिन  कुछ दिन बाद ये

प्रेम का ‘वर्ग’ संघर्ष

       सांझ ढलने को हैं...परिंदें भी अपने आशियानें की ओर लौट रहे हैं...। खेत भी शांत हो चले हैं...।     लेकिन गीत का कोई अता—पता नहीं। मां की आंखें उसे दूर—दूर तलक ढूंढ रही हैं। खेत से दूर बस कच्ची सड़क ही नज़र आ रही हैं...। वह घबराते हुए जोरों से आवाजें लगाती हुई खेतों में घूम रही हैं...गीत..कहां हैं तू...? बेटी गीत..। अरी कहां हैं रे तू...। देख सूरज डूबने को हैं...। घर को चलें...।      कुछ ही देर में गीत सामने से आती हुई दिखती हैं। मां उसे  देखकर बेहद खुश हो जाती हैं। कुछ पल के लिए तो जैसे उसकी सांस गले में ही अटक सी गई थी। लेकिन पास आते ही 'मां' गीत पर बरस पड़ती हैं।      छोरी जात किसी दिन मेरी जान लेकर रहेगी...। कहां मर गई थी तू...।   तभी गीत हंस पड़ी और मां के गले से लगते हुए बोली। मां...तू तो बस यूं ही बेसब्र हो जाती हैं...। अपना लंबा चौड़ा खेत हैं...नीम हैं...अरे! इमली और आमड़ी भी तो अपनी ही हैं...। तो इन्हें छोड़कर कहां जा सकती हूं...। तू भी ना पगली हो जाती हैं...। चल अब घर चलें।       गीत की बातें सुनकर मां भी हंस पड़ी..। और फिर इसी हंसी—ठिठोली के साथ घर कब पहुंच गई दो