Skip to main content

Posts

Showing posts from April, 2021

'गुफ़्तगू' हैं आज 'दर्द' से....

 दर्द के आगोश में गुज़र रही हैं तमाम रातें कभी इस करवट तो कभी उस करवट। आज गुफ़्तगू हैं मेरी दर्द से, साथ निभाओगे या चले जाओगें...। बड़ी ही बेअदबी से दर्द ने कहा,  तेरी रीढ़ में हूं शामिल जाने का तो सवाल ही नहीं बनता...। हैरां हूं मैं, इस ज़माने में कहां मिलता हैं ऐसा प्यार। जो साथ दें, उम्र भर के लिए...। वाह रे दर्द, तूने तो जीत लिया ये दिल  सच कहूं, अब तो आदत सी हो गई हैं तेरी...। बस इक गुज़ारिश हैं तूझसे शामिल—हाल हैं तू...।   कभी टूटने न देना हौंसला मेरा...। जो हैं अब यही हैं... यही हैं... बस यही हैं...।   टीना शर्मा 'माधवी' ---------------------- अन्य कविता यहां पढ़े— कभी 'फुर्सत' मिलें तो चले आना...  

एक 'पगार' ...

    बेटी के जन्मदिन की पांचवी वर्षगांठ थी। सोचा कि एक छोटी—सी बर्ड—डे पार्टी रखी जाए। इस बहाने अपनों से मुलाकात भी हो जाएगी और सारे बच्चे आपस में मिल भी ​लेंगे।      तब पति के साथ मिलकर मेहमानों की लिस्ट तैयार की। करीब सौ लोगों को पार्टी के लिए आमंत्रित किया। काम वाली बाई 'चंदा' का नाम भी इस लिस्ट में था। जब मैंने उसे पार्टी में अपने बच्चों व पूरे परिवार के साथ आने को कहा, तब वह झेपते हुए बोली। दीदी, आप बड़े लोगों की पार्टी में हम कहां मैच होंगे...। मैं, आपकी मदद के लिए आ जाउंगी।     उसकी बात सुनने के बाद मैंने उसे डांटा और कहा, कैसी बातें करती हो 'चंदा'...? तुम भी मेरे परिवार की सदस्य हो, सभी को लेकर आना पार्टी में, समझी...।      पिंक और व्हाइट थीम से सजी पार्टी में हर कोई बहुत ही सुंदर व कीमती कपड़ों में शामिल था..। सभी के हाथों में गिफ्ट्स के बड़े—बड़े पैकेट थे। तेज म्यूजिक के साथ बच्चे थिरक रहे थे और बड़े स्वादिष्ट व्यंजनों का लुत्फ ले रहे थे।     इस पार्टी में चंदा भी अपने परिवार के साथ आई थी। लेकिन वह डरी—सहमी सी थी। मैंने उससे कहा कि मजे करो अपने बच्चों के साथ...

'एकांकी' - नहीं 'चुकाऊंगी' झगड़ा

  समय : 45 मिनट भाषा : हिन्दी ————————————————————                            पात्र परिचय पात्र के नाम                                         उम्र                और  हुलिया।                                     30  रेवती      (मुख्य पात्र)                                    सावली है                                                      लेकिन नैन                                                   नक्श अच्छे हैं। रेवती का पति                                     33                      गुटखा—पान चबाता, आवारा सा  दिखता है रेवती का बेटा                                       6                          नेकर और शर्ट पहने रेवती की मां                                       58                      दुबली सी विधवा औरत रेवती का भाई (सामान्य कदकाठी)        34               रेवती की भाभी (नाटी औरत)                32 पंच—                                              45-60                  कुर्ते पजामें पहने हुए हैं। जो बड़े  रोबदार से दिखते हैं।   कुछ अन्य लोग जो भीड़ के रुप में शामिल होंगे— इसमें  औरतें

कभी 'फुर्सत' मिलें तो...

कभी फुर्सत मिलें तो चले आना इस पते पर जहां बसती हैं यादें तेरे और मेरे अहसासों की...। कभी फुर्सत मिलें तो महसूस कर जाना वो 'सैकंड' जिसकी 'छुअन' अब भी बाकी हैं इन लबो पर...।   कभी फुर्सत मिलें तो एक बार फिर से ढूंढ लेना वो  कान का 'बूंदा' जो गिरा था सरगोशी से तेरी....। चाय की 'तपेली' पर अब भी बाकी हैं निशां जो तुझसे बतियाते हुए जली थी कभी..।  कभी फुर्सत मिलें तो ढूंढना वो आंसू की बूंदे जो गिरी थी 'कार' में जब तूने अपने सीने से लगाया था। कभी फुर्सत मिलें तो ढूंढना अपना वो 'पागलपन' जब इक रात तूने मेरा आंचल हटाने की ज़िद की थी...।  जेब में रखे उस रुमाल से भी पूछना जिससे पूछा था मेरा चेहरा कभी...।    ढूंढना उन कांच के टुकड़ों को भी जो तेरी घड़ी से टूटे थे   कभी.. ।   फुर्सत मिलें तो 'सहलाना' अपने सीने पर बना वो निशां जो इन लबो ने सारी हदें पार करके छोड़ा था कभी...।  आज इस पते पर रहती हैं एक   'खामोशी' कभी फुर्सत मिलें तो चलें आना इसे तोड़ने कभी...।  टीना शर्मा 'माधवी'

'नाटक' को चाहिए 'दर्शक'....

विश्व 'हिन्दी रंगमंच' दिवस 'रामलीला','रासलीला', नौटंकी , स्वांग , नकल , खयाल , यात्रा , यक्षगान और तमाशा के रुप में वर्षो की यात्रा करते हुए 'हिन्दी रंगमंच' आज 2021 में आते—आते 'सोशल मीडिया' के मंच पर पहुंच गया हैं। बरसों से रंगमंच के इन अलग—अलग रुपों में जीता आया हैं एक 'कलाकार'... जिसे ज़िंदा रखें हुए हैं 'दर्शक'...। जो तालियां बजाकर कलाकार में सांस भरते हैं...।    ऐसे में ये सवाल ज़ेहन में उठना ​लाज़िमी हैं, क्या आज ऑनलाइन 'रंगमंच' की स्वीकार्यता संभव हैं...? क्या इसके ज़रिए भी दर्शक और कलाकार के बीच इसकी सौंधी—सौंधी महक को महसूस किया जा सकता हैं...?  जब सारा कुछ ऑनलाइन होने लगा हैं, फिर रंगमंच क्यूं नहीं..?     ये सवाल शायद आप और हम तो सोच सकते हैं...लेकिन एक कलाकार इस सोच को सहजता से स्वीकार नहीं करता। मंच पर जब तालियों की गड़गड़ाहट होती हैं और जिसकी गूंज से पूरा हॉल खिल उठता हैं वो अहसास, वो महक ऑनलाइन रंगमंच में कहां...?        कलाकार मानता है कि 'डिजिटल थिएटर' की शुरुआत कुछ विषम ​परिस्थितियों में हुई है और