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Showing posts from May, 2021

एक पुराना 'हैंडपंप'...

 'कहानी का कोना' में पढ़िए-  वैदेही वैष्णव द्वारा लिखित 'एक पुराना हैंडपंप'...    बिहारी एक सीधा व सरल स्वभाव का इंसान हैं , जो पेशे से डॉक्टर हैं जिसकी नियुक्ति हाल ही में राजस्थान के एक गाँव चिताणुकलां में हुई हैं। उम्र यहीं कोई 30-32 होंगी।  टीना शर्मा' माधवी'  लक्ष्य प्राप्ति के जुनून के कारण अभी तक कुँवारे ही हैं। इसलिए उन्हें गाँव में रहने में रोज किसी न किसी समस्या का सामना करना पड़ता। कभी समय पर भोजन नहीं बन पाता, कभी पीने का पानी खत्म हो जाता। ऐसी कई समस्याएं रोज की बात हो गई थीं।  शहर में तो कई होटल- रेस्तरां देर रात तक खुले मिल जाते पर यहाँ तो सूर्यास्त के बाद ही सन्नाटा पसर जाता।      गाँव में एक बहुत ही पुराना हैंडपंप था, जो बिहारी के घर से कुछ ही दूरी पर था। बस एक यहीं हैंडपंप बिहारी के लिए सुलभ था जहाँ से उसके पीने के पानी की समस्या तुरन्त हल हो जाया करतीं थीं । बिहारी के अतिरिक्त इक्के—दुक्के लोग ही उस हैंडपंप से पानी लिया करते थे। वजह थीं हैंडपंप से जुड़ी एक कहानी जो भूत से संबंधित थीं । कई बार बिहारी जब पानी के लिए हैंडपंप पर जाता तो चौपाल पर बै

'पाती' पाठकों के नाम....

 प्रिय पाठको नमस्कार,      निश्चित ही ये समय बहुत भारी हैं। पूरा विश्व कोविड महामारी से जूझ रहा हैं। दूसरी लहर का ​कहर वाकई दर्द भरा और कभी न भरने वाले घावों की तरह हैं...।        चारों तरफ इसी महामारी का शोर हैं...दर्द की आह हैं...और मदद न मिल पाने की बेतहाशा मजबूरी..। दोष वक़्त का ही हैं जब इंसान एक ऐसे मोड़ पर खड़ा हैं जहां या तो आर हैं या पार...। संवेदनाओें का सैलाब उमड़ रहा हैं लेकिन बस में कुछ नहीं...। इन सबके बाद भी यदि शेष कुछ रहा हैं तो वो हैं 'हौंसला' और 'भरोसा'...।        'कहानी का कोना' की ओर से मैं टीना शर्मा 'माधवी' आप सभी से यही कहना चाहती हूं कि, ऐसे बुरे वक़्त में हिम्मत बनाएं रखें...। कोरोना राक्षस से बचाव के लिए जो भी जरुरी हथियार हैं वो हमेशा अपने साथ रखें जैसे— मास्क... दो गज दूरी...बार—बार हाथ धोना...और सबसे ज्यादा जरुरी वैक्सीन लगवाएं।        काफी दिनों बाद  आज ब्लॉग लिख रही हूं...। क्यूंकि पिछले कुछ दिनों से मैं और मेरा परिवार कोविड समय   से  गुजर रहा  हैं। इसे बिल्कुल भी हल्के में ना लें...। जब इसने मेरे घर में प्रवेश किया तब इसक

ज़िंदा हैं 'पांचाली'....

    कुछ दिन पहले मेरी मुलाकात एक ‘लाडो मित्र’ से हुई। इसका काम गांव-ढाणियों में जाकर बेटी शिक्षा और बेटी बचाओं कार्यक्रम के प्रति लोगों को जागरुक करना हैं। मैंने बस ऐसे ही उससे पूछ लिया कि क्या तुम्हें जागरुकता के दौरान ऐसा कोई घर मिला जहां पर बेटी का बिल्कुल भी मान-सम्मान नहीं...।      पहले तो उसने यही बताया कि, ऐसे तो बहुत घर मिलें...। जब मैंने दोबारा जो़र डालते हुए अपने सवाल को और अधिक स्पष्ट करते हुए पूछा कि, तुम तो पिछले कई सालों से इस ‘जागरुकता कार्यक्रम’ से जुड़ी हुई हो, क्या तुम्हें ऐसी कोई बेटी मिली जिसका संघर्ष शिक्षा पाने से अधिक किसी ओर बात के लिए हो...?          ‘लाडो मित्र’, मेरी बात सुनकर सोच में पड़ गई और तभी उसे ‘हरकू दादी’ का घर याद आया जो टोंक जिलें की एक छोटी सी ढाणी में था। उसने बताया कि, इस घर में उसे एक ‘कजरी’ नाम की लड़की मिली थी। अपनी टीम के साथ इसी घर में कुछ देर सुस्ताने के लिए बैठे थे।        हरकू दादी इस घर की मुखिया के तौर पर हैं जो घर के चैक में खटिया पर बैठे-बैठे हुक्का गुढ़गुढ़ाती रहती हैं। दादी ने उस दिन हम सभी के लिए छाछ की राबड़ी बनवाई थी। थोड़ी ही देर में

'धागा—बटन'...

अलमारी की दराज़ में अब भी उसकी यादें बसती है। उसकी शर्ट का बटन, पेन का ढक्कन और वो कागज़ के टुकड़े....। जो पुड़की बनाकर फेंके थे कभी उसने।     अलमारी की साफ़ सफ़ाई में आज हाथ ज़रा दराज़ के भीतर चला गया...। मानो बटन ने खींच लिया हो जैसे...।     इक पल के लिए दिल जैसे धड़कना भूल गया... और सांसे जैसे थम सी गई...। बरसों बाद लगा  उसकी छूअन को पा लिया हो जैसे।       मन जो तड़पना, तड़पाना भूल गया था... वो आज फ़िर से तड़प उठा...बैचेनी की हुक उठने लगी...जिस्म जैसे बिन बारिश के भीगने लगा...।      कुुछ देर तक अपनी हथेली पर बटन को रखकर बस उसे निहारती रही। उसे अपने क़रीब लाकर उसकी खुशबू को अपने भीतर खींचने लगी।      उस दिन भी तो ऐसा ही कुछ हुआ था। नचिकेत ने ब्ल्यू चेक्स की शर्ट पहनी हुई थी। वो तिलक मार्ग पर मेरा इंतजार कर रहा था...और मैं देरी से पहुंची थी। इस बात पर वो मुझसे बेहद ख़फा हो गया था।      मैंने उसे लाख मनाने की कोशिश की, मगर वो मान जाने को तैयार नहीं था। तभी मैंने उसे अपने गले से लगा लिया और उसे चुप रहने को कहा...।      नचिकेत धीरे धीरे शांत होने लगा और मेरी बाहों में खो गया। जब वो सामान

टूट रही 'सांसे', बिक रही 'आत्मा'

   देश कोरोना से 'कराह' रहा हैं। कोरोना की दूसरी लहर खतरनाक होती जा रही है। यह महामारी अब दिल दहलाने लगी हैं। भारत में इस कोरोना वायरस के  संक्रमण से जान गंवाने वालों की संख्या थमने का नाम नहीं ले रही। बीते दस  दिनों में ही भारत में 3 लाख से अधिक संक्रमित मामले दर्ज किए गए हैं। स्थिति यह हो गई है कि एक दिन में ही रेकार्ड 3,000 से भी ज्यादा लोगों की जानें जा रही है।       संक्रमण के इन बढ़ते आंकड़ों के बीच अपनों को खोते जा रहे हैं लोग...। चारों ओर शमशान घाटों पर शवों की लंबी कतारें लगी हुई हैं...अपनों की एक—एक सांसे बचाने के लिए लोग इधर—उधर भाग रहे हैं...। कभी डॉक्टर्स तो कभी अधिकारियों व मंत्रियों के पैरों में गिर ऑक्सीजन सिलेंडर के लिए गिड़गिड़ा रहे हैं। इस बेबसी की 'आह' का शोर कानों को चीर रहा हैं। मजबूरी चीख रही हैं, बचा लो 'साहब'...।       लेकिन इन डरावनें हालातों के बीच ऐसे बदसूरत और घिनौने चेहरे भी सामने आ रहे हैं जो कहने को तो 'ज़िंदा' हैं लेकिन इनकी आत्मा मर चुकी हैं। इंसान के भेष में ये शैतानी लोग हैवानियत की सारे हदें पार कर रहे हैं। मरीज ऑक्स