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Showing posts from June, 2021

मेरी 'चाहतों' का घर...

दफ्तर की खिड़की से झाँकता हुआ सूरज ठीक मेरे सामने कुछ इस तरह आ गया मानों कह रहा हो अलविदा ! कल फिर आऊँगा । मैं टकटकी लगाए हुए डूबते सूरज को देखती रहीं । अस्त होता सूरज दिल में सूनापन भर देता हैं । धीरे - धीरे से सरकता हुआ सूरज पश्चिम दिशा में ऐसे दुबक गया मानो अपने घर चला गया हों । घर को जाते पँछी जब झुण्ड बनाकर आसमान में दिखते तो लगता मुझसें कह रहें हो तुम किसके साथ घर जाओगी ?   टीना शर्मा घर सबकों जाना होता है फिर चाहें वो पँछी हो या सूरज ! मुझें सूरज का आना औऱ जाना दोनों पसन्द हैं क्योंकि सूरज अकेले ही आता हैं औऱ अकेले ही चला जाता हैं बिल्कुल मेरी तरह ! मुझें क़भी अपने सहकर्मियों को साथ आते जाते देखकर कोफ़्त नहीं हुई फिर आजकल क्यूँ मैं किसी लव बर्ड को देखकर चिढ़ने लगीं हुँ । जो जिंदगी मैं जी रहीं हुँ यहीं तो मेरा सपना था। फिर क्यों मन में वो संतोष नहीं हैं ?इस सफ़ल जिंदगी को जीने के लिए मैंने कितने पापड़ बेले थें ? कितनी ही इच्छाओं का गला घोंट दिया था ? मुझें तो प्यार औऱ शादी जैसे लफ़्ज़ से भी चिढ़ हुआ करतीं थीं । फिर अब क्यों मुझें किसी साथी की कमी महसूस होतीं हैं । मेरे दिल औऱ दिमाग के बीच

बजता रहे 'भोंपू'....

      कोरोना संक्रमण की गति कम होने से देश अब फिर काम पर लौट रहा हैं निश्चित ही ये एक 'शुभ' संकेत हैं। लेकिन इसके बावजूद लोगों में 'कोरोना गाइडलाइन' को लेकर कोई गंभीरता नज़र नहीं आ रही हैं। इसकी बानगी बाज़ारों में उमड़ रही भीड़ में देखी जा सकती हैं।     हमें ये कतई नहीं भूलना चाहिए कि पहली लहर के कमजोर पड़ने के बाद भी यहीं हुआ था। जिसके गंभीर परिणाम हमनें दूसरी लहर के रुप में देखे थे और अभी तक उसे देख रहे हैं। किस तरह एक झटके में ही लाखों जिंदगियों को 'लील' गया ये 'कोरोना'। ताजा आंकड़ों पर गौर करें तो देश में कोरोना वायरस से अब तक 3 लाख 90 हजार 691 कुल मौतें हो चुकी हैं। वहीं प्रदेश में 8 हजार 904 और राजधानी जयपुर में 1 हजार 967 मौतें।          अपनों के मर जाने का दर्द क्या होता हैं ये उनसे ही पूछिए जिनके आंसू अभी तक सूखे नहीं हैं...। इसके बाद भी हम लोग वहीं गलती दोहरा रहे हैं। आखिर इतनी बड़ी भूल करने के लिए हम तैयार कैसे हो गए हैं...? जबकि कोरोना जैसा राक्षस अब भी मुंह फाड़े हुए बाहर खड़ा हैं। कब समझेंगे हम इत्ती सी बात...? आखिर कब...? ये सवाल अब भी शेष

'ओलंपिक ' — कितना सही ....?

 इंटरनेशनल ओलंपिक—डे क्या हम भूल रहे हैं कि हम एक ऐसे जहाज पर सवार हैं जो कोरोना तूफान से डगमगा रहा हैं...। क्या हम वाकई ये भूल बैठे हैं कि ये जहाज बुरी तरह से जख्मी हैं...क्या सच में हमें याद नहीं रहा कि दूसरी लहर में किस तरह इस तूफान ने मौत का तांडव दिखाया हैं...।      लाखों जिंदगियां इस जहाज पर कोरोना के कहर से दम तोड़ चुकी हैं और कितनी ही अब भी इसके सिरे को पकड़े हुए आर या पार की स्थिति में हैं। मानाकि ​कोरोना के कारण ओलपिंक खेलों का आयोजन पहले ही एक साल टल चुका हैं। फिर भी ऐसे नाजुक वक्त पर क्या जरुरी हो सकता हैं...?      वे सारे संभव प्रयास जो जहाज पर सवार जिंदगियों को बचाने के लिए होने चाहिए...? या फिर उन चंद लोगों के लिए 'पिज्जा—बर्गर' जैसे जंक फूड का शौक पूरा करना...?  टीना शर्मा      एक छोटा बच्चा भी इसका सही और सटीक जवाब दे देगा। फिर तमाम देशों की सरकारें तो अच्छा खासा दिमाग रखती हैं।       क्या इस वक़्त 'ओलंपिक खेलों' का आयोजन करना एक 'बचकाना' चर्चा नहीं हैं जो इस समय की जा रही हैं।  क्या जिंदगी बचाने से भी कोई बड़ी मजबूरी आन पड़ी है जिसकी वजह से ओलं

'फटी' हुई 'जेब'....

आज 'फादर्स—डे' हैं। ये दिन पिता के प्रति अपनी कृतज्ञता दिखाने का ​सिर्फ एक माध्यम हैं। निश्चित ही बदलते वक़्त के साथ आज एक गंभीर और कड़क स्वभाव वाले पिता की जगह 'नरम दिल' और 'दोस्ताना' व्यवहार के साथ आज का पिता खड़ा हैं। यह एक अच्छा साइन भी हैं...।       पिता चाहे गरीब हो या अमीर वह सिर्फ अपने बच्चों की इच्छाएं पूरी करने में लगा रहता हैं...   और असल में यहीं हमारी संस्कृति का हिस्सा भी हैं। इसी भावनात्मक रिश्तें पर आधारित हैं ये कविता....।       बाप की 'फटी' हुई जेब से जो ख्वाहिशें पूरी हुई        वो 'बेहिसाब' हैं...।   खिलौना खरीदने की औकात न थी, फिर भी खरीद कर दे देने की    उनकी हिम्मत  भी  'बेहिसाब' हैं।   सिद्धी शर्मा     'राजकुमारी' की तरह अपनी पलकों पर बैठाकर रखने का      उनका हौंसला भी बेहिसाब हैं..।      इच्छा पूरी न कर पाने की उनकी अपनी    मजबूरियां  भी बेहिसाब हैं...।      आंखों में आंसूओं को छुपाकर रख लेने का उनका      अंदाज भी बेहिसाब हैं...।      और मेरी खुशी देख अपने होंठों पर मुस्कान सजाकर      रखना भी 'बेहिसाब&

कबिलाई— एक 'प्रेम' कथा

    जोरों की बारिश आज मानो शंकरी के जी को जला रही थी...कहने को मौसम सुहाना हो गया था लेकिन भीतर की आग ने शंकरी को सोहन की याद में बिल्कुल जला डाला था...। बिस्तर पर औंधे मुंह पड़ी शंकरी कभी बारिश को कोसती तो कभी ख़ुद के हाल पर तरस खाती...।  टीना शर्मा 'माधवी' वह बार—बार टेंट से बाहर जाती और बारिश की बूंदों को अपनी ह​थेलियों पर लेकर मुट्ठी को कसकर बांध लेती...। एक पल के लिए वह सोहन को नजदीक महसूस करती...तो दूजे ही पल अपनी मुट्ठी खोल उसे अपने से बेहद दूर पाती...।      आज पूरे नौ बरस हो गए शंकरी को अपने सोहन से बिछड़े हुए...। उस दिन भी ऐसी ही तेज बारिश हो रही थी...। घना जंगल...और चारों तरफ घोर अंधेरा...। इसी बीच एक भटका हुआ मुसाफ़िर अपनी पंक्चर हुई चार पहिया गाड़ी के पास किसी की मदद मिल जाने की राह तक रहा था...। चेहरे पर तनाव और डर की लकीरें थी..। धीरे—धीरे रात गहरा रही थी...शीशे चढ़ाकर वह गाड़ी में ही बैठा रहा...। इस मौसम में दूर—दूर तलक उसे मदद मिल पाने की गुंजाइश न रही..। तभी उसे एक मोटर साइकिल नज़र आई...।             उसने गाड़ी से बाहर निकलकर हाथ हिलाया और उन्हें रुकने को कहा .