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Showing posts from July, 2021

'मुंशी प्रेमचंद'—जन्मदिन विशेष

      'हल्कू ने आकर स्त्री से कहा—सहना आया है, लाओ, जो रुपए रखे हैं, उसे दे दूं, किसी तरह गला तो छूटे'...।         ये पंक्तियां हिन्दी के महान लेखक, उपन्यासकार, संवेदनशील रचनाकार और युग प्रवर्तक मुंशी  प्रेमचंद जी द्वारा रचित कहानी 'पूस की रात' में लिखी गई हैं। जो आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी कि उस वक़्त थी, जब ये लिखी जा रही थी। आज इस महान लेखक का जन्मदिवस हैं।        मुझे लगा इस मौके पर इस कहानी का जिक्र होना चाहिए। यूं तो आप में से कईयों ने इसे अपने कोर्स की क़िताबों में भी पढ़ा होगा लेकिन आज जितनी परिपक्वता से आप इस कहानी के मर्म और द्वंद को समझेंगे उतना शायद बचपन की पढ़ाई के दौरान नहीं महसूस किया होगा।         खेती करना कोई आसान बात नहीें..। न जानें कितनी ही मेहनत करके भी कई बार उतने दाम नहीं मिल पाते जिससे जीवन की गुज़र—बसर मजे में हो सके..। प्रेमचंद जी ने हल्कू और मुन्नी के माध्यम से खेती और उसकी रखवाली करने का दर्द...और कैसे जरुरत पड़ने पर एक कम्बल तक न खरीद पाने की मजबूरी को बयां किया हैं...।        काफी अंर्तद्वंद के बाद कर्ज में डूबा हल्कू, सहना का उधार

कबिलाई— एक 'प्रेम' कथा.... भाग—4

        उसे कुछ संशय हुआ...वह तेज कद़मों के साथ शंकरी की ओर बढ़ा। उसे अपनी तरफ़ आता हुआ देख शंकरी ने फोरन अपने आंसू पोंछे और वह इधर—उधर देखने लगी। तभी सरदार का भाई उसके पास आ गया। उसने पूछा अरे, शंकरी तुम ठीक हो ना...और सोहन किधर हैं...?     इस पर शंकरी ने कहा वही तो मैं भी देख रही हूं...आख़िर सोहन है कहां...?      उसकी बात सुनते ही सरदार का भाई टेकरी के चारों ओर सोहन को ढूंढने लगा। काफी देर तक वह उसे ढूंढता रहा...थक हार कर वह पार्किंग में आया तो उसने देखा कि सोहन की गाड़ी भी नहीं हैं...उसे यकीन होने लगा कि सोहन भाग निकला हैं। वह तुरंत शंकरी के पास आया और बोला वो कहीं नहीं मिला...उसकी गाड़ी भी नहीं हैं...उसने तुम्हें धोखा दिया हैं...पूरे कबिले की मान—मर्यादा को ठेंगा दिखा गया हैं...। चलो कबिले में चलकर इसकी सूचना भीखू सरदार को देते हैं...।       शंकरी ये सब सुनकर रोने का नाटक करने लगी जिससे सरदार के भाई को ये पक्का विश्वास हो जाए कि, सोहन सच में भाग गया हैं....और शंकरी को इस बारे में कुछ भी जानकारी नहीं हैं...।        और हुआ भी ऐसा ही...। सरदार के भाई ने शंकरी के आंसू पोंछे और उसे दिला

कबिलाई— एक 'प्रेम' कथा... भाग—3

  तंबू  के भीतर दोनों अकेले थे, ये वो मौका था जिसके लिए सोहन तरस रहा था...। उसने बिना समय गवाए शंकरी से पूछा...आख़िर ये सब क्या हो रहा हैं शंकरी...। तुमने मुझे अपने पिता के सामने अपनी बात रखने से क्यूं बार—बार रोका...आख़िर क्यूं...? मैं जानना चाहता हूं।        लाल चूनर ओढ़े खड़ी शंकरी उसे देखती रही..। उसने अपने सर से चूनर हटाई और उसे खूंटी पर टांग दिया...। उसने सोहन का हाथ पकड़ा और उसे सुहाग की सेज पर बिठाया...।       तभी सोहन फिर बोल पड़ा...अब ये सब क्या हैं...मुझे मेरे सवाल का जवाब क्यूं नहीं देती...? शंकरी ने  मुंह पर हाथ रखते हुए उसे चुप कर दिया...।         अरे..! सोहन बाबू...आप जरा चुप रहेंगे..सब बताती हूं। शंकरी ने गहरी सांस ली और सोहन से कहा कि तूफानी रात में आप परेशान थे और अपनी मां से बात करने के लिए बैचेन थे...। मैंने उस रात आपको जो मोबाइल लाकर दिया था वो मेरी सहेली 'कांजी' का था।       कबिले में इसकी जानकारी किसी को भी नहीं हैं। यदि मेरे पिता भीखू सरदार के कानों तक ये ख़बर पड़ जाती कि कांजी कबिलाई नियमों का उल्लंघन कर मोबाइल अपने पास रखे हुए हैं तब वो उसे छोड़ते नहीं

ठहर जाना ऐ, 'इंसान'.....

 'ललाट' पर जब घमंड तमतमाने लगे, 'प्रेम' की जगह कुटिल हंसी जब आलिंगन करने लगे..।      ख़ुद ही की जब तारीफ़े पसंद आने लगे, औरों का 'वजूद' ही जब बौना लगने लगे...।      तब ठहर जाना ऐ, 'इंसान' देख लेना अपना 'गिरेबान' भी कभी...।   जिस पर जमा है बरसों का 'मैलापन' कहीं जो औरों को कम आंकते—आंकते  अब बन चुका हैं 'काई'...।      ख़ुद की 'सड़न' भी सुंघ लेना कभी तभी महसूस होगी औरों की 'ख़ुशबू' कभी....।  मत भटक फ़ितरतबाज़ी में, चार पल की ही तो हैं ​जिंदगानी...। जी भर जी लें, ख़ुद ही के अफसानों संग  क्या ख़बर 'इसका—उसका' में  ग़ुजर न जाए ये शाम मस्तानी...। ठहर जाना ऐ, 'इंसान'   टीना शर्मा 'माधवी'

'रबर—पेंसिल' ....

    बड़ी ही हैरानी की बात हैं, जिस जनरेशन ने अपना बचपन  अभी पूरा नहीं जिया है वो ही 'जनरेशन' कह रही हैं 'क्या दिन थे वो'....। 'जब हम स्कूल में पढ़ने जाया करते थे'...।      'अमेजिंग'...'रियली वैरी मेमोरेबल डेज़'...।  'क्या दिन थे वो जब लंच टाइम पर एक—दूसरे के टिफिन का खाना शेयर किया करते थे'...'क्या दिन थे वो जब ​मैम किसी एक को डांटती तब उस पर मंद—मंद मुस्कान के साथ दबी—दबी हंसी सभी की छूटती'....। एक—दूसरे को देखते और फिर मुंह पर हाथ रखकर हंसी दबाने की कोशिश करते ...।         न जानें कब खुलेंगे स्कूल....?       कब वैन वाले अंकल का हॉर्न सुनाई देगा...?       कब यूनिफॉर्म और स्कूल श़ूज पहनने को मिलेंगे...?      कब खेल मैदान में दोस्तों के बीच 'रेस' होगी...?    आख़िर कब सुनाई देगी वो स्कूल की घंटी...?      ये व्यथा हैं 'ऑनलाइन क्लास' में बैठ रहे दो मासूम दोस्तों की...। जो क्लास से फ्री होने के बाद एक—दूसरे से रोज़ाना वॉट्सएप चैट पर हैलो—हाय करते हैं। कभी—कभार वीडियो कॉल भी कर लेते हैं...। लेकिन आज दोनों बेहद उदास हैं..

कबिलाई— एक 'प्रेम' कथा.... भाग—2

  मध्यम धूप खिलने लगी...बीती रात जो तूफान—बारिश आई थी उस पर 'मखमली' धूप की चादर बिछ गई...ऐसा लगा मानो तूफान सिर्फ सोहन को कबिलाईयों के बीच लाने भर के लिए ही उठा हो।  टीना शर्मा       सोहन पूरी रात सो नहीं पाया। वह समझ नहीं पा रहा था कि इस समय वो कैसे यहां से निकलें...। उसे एक ही बात अधिक सता रही थी आख़िर शंकरी ने अपने पिता भीखू सरदार से झूठ क्यूं बोला...? उसने ये क्यूं कहा कि वो मुझे पसंद करती हैं...?         अगले दिन सुबह जब कबिलाई एक साथ बस्ती के टिबड्डे पर पहुंचे तब शंकरी के साथ उसे भी खड़ा किया गया। तब उसने शंकरी से धीमे स्वर में पूछा, ये सब क्या हो रहा हैं शंकरी...?       मैं तुमसे शादी नहीं कर सकता ...। मेरी मां, परिवार और रिश्तेदार कभी—भी इस बात के लिए राज़ी नहीं होंगे कि मेरी शादी एक कबिले की लड़की से हो। शंकरी मुझे इस बंधन में बंधने से बचा लो...।       निश्चित ही तुम बहुत ही सुंदर और ​साफ़ दिल की लड़की हो लेकिन मेरी अपनी मजबूरी को भी समझो...।      शंकरी चुपचाप सोहन की बातें सुनती रही...जैसे ही उसने बोलने के लिए मुंह खोला तभी भीखू सरदार की अगुवाई में बिगुल बजने लगा। बस्

मेरी 'चाहतों' का घर...भाग—2

'कहानी का कोना' में पढ़िए लेखिका वैदेही वैष्णव 'वाटिका' द्वारा लिखित कहानी का दूसरा भाग  'मेरी चाहतों का घर'...।   जिस प्रश्न को सुनकर मैं चिढ़ जाया करतीं हुँ वहीं प्रश्न मैं आनंद से कैसे पूछूं ?        ज़िंदगी भी किसी किराये के मकान की तरह लगतीं हैं । कभी जिंदगी में ढ़ेर सारी खुशियाँ दबे पाँव दस्तक दे देतीं हैं तो कभी बिन बुलाए मेहमान की तरह गम आ जाता हैं । जिंदगी के इस मकान में रहने वाले ये किराएदार ख़ुशी और गम क़भी स्थायी नहीं रहतें ।   सिद्धी शर्मा                                          आनंद   की आँखों के द्वार से होकर मैं उसके मन के उस कमर्रे तक पहुँच जाना चाहतीं थीं जहाँ उसने अपने गम दफ़न किए हुए थें । आनंद की आँखे अक्सर उसके मन की बात बयाँ कर देतीं थीं । जिन्हें पढ़कर मैं उसके दर्द बाँट लिया करती थीं। स्कूल-कॉलेज के समय आनंद कितना बातुनी हुआ करता था। अब उसके चेहरे पर गहन मौन उसे समुंद्र सा शांत बना रहा था। आनंद की खामोशी मेरे मन को विकल कर रहीं थीं। मेरे अंदर प्रश्नों का सैलाब मुझें परेशान कर रहा था। तभी मयंक औऱ संजना आए। उनको देखकर फीकी सी मुस्कान मेरे चेहरे