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मेरी 'चाहतों' का घर...भाग—2

'कहानी का कोना' में पढ़िए लेखिका वैदेही वैष्णव 'वाटिका' द्वारा लिखित कहानी का दूसरा भाग  'मेरी चाहतों का घर'...। 

जिस प्रश्न को सुनकर मैं चिढ़ जाया करतीं हुँ वहीं प्रश्न मैं आनंद से कैसे पूछूं ? 

      ज़िंदगी भी किसी किराये के मकान की तरह लगतीं हैं । कभी जिंदगी में ढ़ेर सारी खुशियाँ दबे पाँव दस्तक दे देतीं हैं तो कभी बिन बुलाए मेहमान की तरह गम आ जाता हैं । जिंदगी के इस मकान में रहने वाले ये किराएदार ख़ुशी और गम क़भी स्थायी नहीं रहतें ।

  सिद्धी शर्मा

                                        
आनंद  की आँखों के द्वार से होकर मैं उसके मन के उस कमर्रे तक पहुँच जाना चाहतीं थीं जहाँ उसने अपने गम दफ़न किए हुए थें । आनंद की आँखे अक्सर उसके मन की बात बयाँ कर देतीं थीं । जिन्हें पढ़कर मैं उसके दर्द बाँट लिया करती थीं।

स्कूल-कॉलेज के समय आनंद कितना बातुनी हुआ करता था। अब उसके चेहरे पर गहन मौन उसे समुंद्र सा शांत बना रहा था। आनंद की खामोशी मेरे मन को विकल कर रहीं थीं। मेरे अंदर प्रश्नों का सैलाब मुझें परेशान कर रहा था।

तभी मयंक औऱ संजना आए। उनको देखकर फीकी सी मुस्कान मेरे चेहरे पर तैर गई। संजना कुर्सी पर बैठते हुए बोली - फाइनली तुम दोनों में सुलह हो गई। इस बात पर मयंक बोला - होनी ही थीं , दोस्त कभी बिछड़ा नहीं करतें , जो बिछड़ जाएं वो दोस्त हुआ नहीं करतें । मैंने कहा - इरशाद - इरशाद ...

    तभी इरशाद मेरी तऱफ आया औऱ कहने लगा - जी आपने मुझें बुलाया ? इरशाद की इस बात पर हम चारों हँस दिए। इरशाद ने भी हम लोगों को जॉइन कर लिया। हँसी ठिठौली से मन कुछ ठीक हुआ। 

फिर चला फोटोसेशन का दौर। तस्वीरों में ही यह ताकत होतीं हैं कि वह समय को कैद कर लेतीं हैं। फिर भी मुझें फ़ोटो क्लिक करवाने का शौक कम ही था। मैं ग्रुप से हटकर खिड़की की औऱ चली गई औऱ बाहर देखने लगीं । हवा में उड़ते बादल ऐसे जान पड़ रहें थे जैसे बूंदों को पीठ पर लादे हुए आ रहें हैं औऱ सारी बूंदे धरती पर उड़ेल देंगे। हल्की बूंदाबांदी शुरू हो गई। पार्टी भी लगभग समाप्ति की औऱ थीं । 2004 आकार का बना हुआ केक लाया गया , जिसे अमित सर ने काटा।

       सबसे अलविदा लेकर हम अपने घरों की औऱ लौटने लगें। बारिश की हल्की बूंदे अब तेज़ धार हो गई थीं। मैं भीगते हुए अपनी स्कूटी की औऱ गई। मुझें भीगना अच्छा लग रहा था । बारिश की हर एक बूंद को मैं खुद में समेट लेना चाहती थीं। बूंदे भी टप-टप करके बरसती रहीं। तभी छाता ताने हुए आनंद वहाँ आया औऱ डाँटते हुए मुझसे बोला - मैं कार से तुम्हें घर छोड़ दूँगा। ऐसे भीगकर जाओगी तो बीमार पड़ना तय हैं। आनंद के लहजे में डांट कम फिक्र ज़्यादा थीं।

" कुछ नहीं होगा , मैं चली जाऊंगी तुम तकल्लुफ़ न करों " - मैंने औपचारिक लहज़े में कहा।

         इस बात पर आनंद इतना नाराज़ हुआ कि वह फुर्ती से मेरी औऱ आया औऱ उसने झुककर मेरी स्कूटी को लॉक किया औऱ चाबी अपनी जेब में रख लीं। औऱ वहाँ से जाने लगा। मैं आनंद को जाते हुए देखती रहीं। वह बिल्कुल नहीं बदला था। मैं भी चुपचाप कीचड़ में बने आनंद के कदमों के निशान पर अपने पैर रखते हुए चलने लगीं। 

'किआ सॉनेट' आनंद की गाड़ी को देखकर मैं अचंभित हो गई। उसने कहा - हाँ कुछ समय पहले ही ली हैं । मैंने कहा - मैंने भी किआ सेल्टोस ली हैं। आनंद बोला - वन्डरफुल , वी बोथ लाइक सैम! आनंद ने गाड़ी स्टार्ट कर दी। मैं असहज औऱ अनमनी सी हो रहीं थीं। बहुत समय बाद मैं आनंद के साथ जा रहीं थीं।

रास्ते में जायका चाट भंडार की दुकान देखकर आनंद ने बिना मुझसें पूछे गाड़ी दुकान के सामने रोक दी । गाड़ी के शीशें को नीचे करके आनंद ने दुकान पर खड़े लड़के को आवाज लगाई - छोटू छोले टिकिया पैक कर दे।

छोटू बोला आनंद भैया थोड़ा टाइम लगेगा। आनंद ने मेरी औऱ देखा फिर छोटू की औऱ मुखातिब हो कहने लगा - अच्छा ठीक हैं , बनाकर रखना मैं थोड़ी देर बाद आता हूँ।

" ठीक हैं भैया " - कहकर छोटू अपने पिताजी की मदद करवाने लगा।

आनंद चुपचाप गाड़ी ड्राइव करता रहा। गाड़ी में पसरी शांति को आनंद ने म्यूजिक ऑन करके संगीत लहरियों में बदल दिया। " रिमझिम गिरे सावन सुलग - सुलग जाए मन " यह गीत मौसम को और भी सुहावना बना रहा था। बरसात से गाड़ी के शीशो पर मानो कोहरा सा छा गया हो। मैंने आदतन शीशे पर पहले स्माइली फेस बनाया औऱ फिर उसे मिटा दिया। मैं बाहर बारिश को देखने लगीं। मेरी आँखें जुगनुओं सी चमक उठीं।सड़क पर गिरती बारिश की बूंदे ऐसी लग रहीं थीं जैसे जल तरंग बज रहें हो । बारिश न सिर्फ तपती धरती को शीतल कर रहीं , बल्कि मेरे मन को भी ठंडक पहुँचा रहीं थीं। मेरे मन का मयुर नाच उठा था। तभी आनंद ने एक कागज का टुकड़ा मेरी औऱ बढ़ाते हुए कहा - लो इसकी नाव बना लों ।

मैंने अचंभित होकर आनंद को देखा । क्या आनंद को अब भी वो सारी बाते याद हैं जो मैंने स्कूल औऱ कॉलेज के समय शेयर की थीं ? मैंने आनंद से कागज लिया औऱ नाव बनाने लगीं।

आनंद ने गाड़ी अपने घर के सामने रोक दी। मैंने सवालियां निग़ाहों से आनंद को देखा तो वो बोला - तुम चलों मैं छोटू की दुकान से छोले - टिकिया लेकर आता हूँ। मेरी कबर्ड से नया टॉवल ले लेना। तुम्हारे बाल ज़्यादा समय तक भीगे रहें तो तुम्हें सर्दी लग जायेगी। मुझें घर की चाबी थमाकर आनंद छोटू की दुकान की औऱ चला गया। मैं वहीं खड़ी आनंद की गाड़ी को तब तक देखती रहीं जब तक कि वह मेरी आँखों से औझल न हुई ।

अरसे बाद मैं आनंद के घर के दरवाज़े पर खड़ी थीं। मैं पहले भी कई बार आनंद के घर आ चूँकि थीं। पर आज लग रहा था जैसे पहली बार किसी अजनबी के घर आई हूँ औऱ ताला खोलते समय मेरे हाथ कुछ इस तरह से कांप रहें थे जैसे मैं कोई चौर हुँ। मैंने दरवाजा खोला तो मेरे आश्चर्य की कोई सीमा नहीं रहीं । आनंद ने अपने घर का पूरा इंटीरियर बदल दिया था। उसके घर का कोना - कोना इस तरह से सजा हुआ था जैसा मैं उसे बताया करती थीं। मैं अक्सर आनंद से अपनी चाहतों के घर के बारे में बात किया करतीं थीं। आँखों में अंसख्य सपने लिए सुनहरे भविष्य का निर्माण करतें हुए मैंने बीसियों बार अपने सपनों का घर बनाया था - मेरा घर ऐसा होगा जिसमें आकर यह न लगें की किसी लग्ज़री होटल में आ गए हैं। मेरे घर के कोनो में ब्रॉन्ज के स्टेच्यू खड़े नहीं होंगे बल्कि हर कोना भारतीय संस्कृति से सराबोर कलाकृतियों से सजा हुआ होगा जो टेराकोटा की बनीं होंगी। मेरे घर के लिविंग रूम के फ़र्श पर कश्मीरी फ़ारसी सिल्क कार्पेट बिछा होगा। किसी कोने में एक फूलदान होगा जिसमें जरबेरा के रंग-बिरंगे ताज़े फूल होंगे। एक कोना संगीत लहरियों को सुबह - शाम छेड़ा करेगा।

दिल के आकार का डोरमैट जिस पर पैर रखकर आंगतुक यह महसूस करेंगा कि वह मेरे घर नहीं बल्कि मेरे दिल में ही प्रवेश कर रहा हैं।

अपने सपनों के घर को साकार रूप में देखकर मैं हैरान थीं। हूबहू मेरे सपनों जैसा मकान बना देना आनंद के लिए शायद कोई बड़ी बात न होंगी । वह पेशे से आर्किटेक्ट जो ठहरा। पर मेरे लिए यह किसी अजूबे की तरह था। मैंने घर के किचन से लेकर हर कमरे को कौतूहल से देखा। एक कमरे में अंधेरा था। मैं बत्ती जलाने के लिए जैसे ही आगें बढ़ी मेरे पैर से कोई भारी चीज़ टकराई। मैंने मोबाईल टार्च ऑन किया तो देखा एक लकड़ी का बना खूबसूरत सन्दूक था। मैंने बत्ती जलाई औऱ सन्दूक के पास बैठ गईं। सन्दूक पर लिखा था - यादों का कारवाँ ।

मैंने उत्सुकता से सन्दूक खोल लिया। सन्दूक में बिखरी यादों को देखकर मैं चौक गई । उसमें मेरे हेयर क्लिप , एक झुमकी जो कॉलेज फेयरवेल पार्टी में गुम हो गई थीं , मेरा पेन , रिबन ,नोटबुक औऱ भी छोटी - मोटी चीजें थीं। कुछ सुखें गुलाब के फूल थे औऱ एक कार्ड जो हूबहू वैसा ही था जो मैंने आनंद के मुहँ पर गुस्से में दे मारा था। सुनहरे पेपर से कवर की हुई एक डायरी थीं। मैंने डायरी उठाई औऱ उसे पढ़ने लगीं। डायरी के पहले पेज पर आनंद ने स्कूल के पहले दिन के बारे में लिखा था , जिसमें मेरा जिक्र एक नकचढ़ी लड़की के तौर पर किया गया था। फिर हमारी दोस्ती का किस्सा मिला। औऱ फिर दोस्ती तोड़ देने वाला वो 14 फरवरी का दिन। इस दिन के बारे में आनंद ने जो लिखा था उसे पढ़कर मुझें लगा जैसे मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। बाहर बिजली भी यूँ कड़की जैसे बादल नहीं मेरा दिल फटा जा रहा हैं।

आनंद ने लिखा था - मालिनी...मेरी सबसे अच्छी दोस्त ! उसके साथ वक़्त बिताते हुए कब जिंदगी बीता देने की ख्वाहिश जग उठी मुझें पता ही नहीं चला। उसके लिए ये वक़्त , ये साथ सिर्फ़ दोस्ती के दायरे में सिमटा रहा। इन दायरों के दरमियाँ मेरे मन में कुछ औऱ भी पनप रहा था , शायद इसी को पहला प्यार कहते हैं । मैं अपने रिश्ते को दोस्ती के पायदान से ऊपर ले जाना चाहता था। इसीलिए मैंने फैसला किया कि मालिनी से अपने दिल की बात आज यानि 14 फ़रवरी को कह दूँगा।

" मेरे मन के किसी कोने से उठता हुआ दर्द मेरी आँखों से छलक उठा। डबडबाई आँखों से मैं अगला पेज पढ़ने लगीं । "

आनंद ने सेड इमोजी बनाकर लिखा था - आज का दिन मेरी ज़िंदगी का सबसे बुरा दिन था। मैंने आज अपनी ज़िंदगी को खो दिया..काश मैं मालिनी से सच कह पाता कि किसी औऱ लड़के का मैसेंजर बनकर नहीं आया हूँ , बल्कि अपने ही दिल का हाल सुनाना चाहता हुँ। तुम्हें बताना चाहता हुँ कि तुम मेरे जीवन का सूरज हो जिसके आने से मेरे जीवन की बगिया खिल उठती हैं,,,मेरा जीवन रोशन हो जाता हैं। जैसे पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करतीं हैं वैसे ही मैं भी हर प्रहर तुम्हारे इर्दगिर्द रहना चाहता हूँ। तुम्हारे साथ अपनी सुबह गुलाबी , शाम सिंदूरी औऱ रात आसमानी करना चाहता हूँ । पर अकेलापन ही मेरे मुक़्क़द्दर में लिखा था...

तुमसे बिछड़ने के बाद सीख लिया हैं मैंने ख़ुद को संभालना , मुश्किल वक़्त में सब्र रखना , दूर रहकर भी फिक्र करना। कभी जब यादों के गलियारों से तुम भी गुज़रो तो मेरे लिए वो पुराने दिन चुरा लाना जब तुम मेरे साथ हुआ करती थीं ।

मैं औऱ अधिक नहीं पढ़ पाई। डायरी को बंद करके उसे कसकर अपने सीने से लगाकर मैं रो पड़ी। मेरी आँखों से आँसुओं की झड़ी बहने लगीं ! प्रेम , गुस्से औऱ भावनाओं से भरा बादल मेरी आँखों से बरस रहा था ! अब मैं आँसुओ की बरसात में भीग रहीं थीं !

पीछे से चिरपरिचित आवाज़ आई - " अपने कीमती आँसू यूँ जाया न करों "मैंने मुड़कर देखा तो दरवाज़े पर आनंद खड़ा था।

मैं उठी औऱ आनंद से लिपट गई। उसने मुझे कसकर अपनी बांहों में भींच लिया। इतने वक्त की दूरी इस एक पल की नज़दीकियों में मिट गयी थी।

     मेरे सपनों का राजकुमार मेरे साथ ही था , मैं ही उसे पहचान नहीं पाई थीं । अरसे बाद अकेलेपन की धूप में तपती मैं अब आनंद का साथ पाकर शीतल चाँदनी को महसूस कर रहीं थीं । पहली बार मैं अपना होना महसूस कर रही थी। मिल गयी थी मुझे मेरी छोटी-सी दुनिया जिसमें सिर्फ़ प्रेम होगा , जहाँ मैं जैसी हुँ वैसी ही रहूँगी ।

मैंने मम्मी को कॉल किया । मम्मी ने तुरंत कॉल रिसीव कर लिया। गम्भीर औऱ चिंतित स्वर में वो बोली - बेटा कहाँ हो तुम ? कितनी तेज़ बारिश हो रहीं हैं..अकेले कैसे आओगी ? पापा को भेजतीं हुँ तुम जगह बताओं । एक साँस में ही मम्मी ने सारे प्रश्न एक साथ पूछ डाले थे।

मैंने इत्मीनान से कहा - घबराओं नहीं मम्मी मैं आनंद के घर पर हुँ । अकेले नहीं आनंद के साथ आऊँगी । अपने सपनों के राजकुमार के साथ....

मम्मी ने ख़ुशी से कहा - सच ! तुम आनंद से अब नाराज़ नहीं हो ? लगता हैं भगवान ने आज मेरी सुन ही लीं।  इस सप्ताह ही होगी मेरी राजकुमारी की शादी ------

लेखिका— वैदेही वैष्णव 'वाटिका'

पहला भाग— 

मेरी 'चाहतों' का घर...

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नोट— [  'कहानी का कोना' में प्रकाशित अन्य लेखकों की कहानियों को छापने का उद्देश्य उनको प्रोत्साहन देना हैं। साथ ही इस मंच के माध्यम से पाठकों को भी नई रचनाएं पढ़ने को मिल सकेगी। इन लेखकों द्वारा रचित कहानी की विषय वस्तु उनकी अपनी सोच हैं। इसके लिए 'कहानी का कोना' किसी भी रुप में जिम्मेदार नहीं हैं...।  ]


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