Skip to main content

ठहर जाना ऐ, 'इंसान'.....

 'ललाट' पर जब घमंड तमतमाने लगे,

'प्रेम' की जगह कुटिल हंसी जब आलिंगन करने लगे..। 

    ख़ुद ही की जब तारीफ़े पसंद आने लगे,

औरों का 'वजूद' ही जब बौना लगने लगे...। 

    तब ठहर जाना ऐ, 'इंसान'

देख लेना अपना 'गिरेबान' भी कभी...।

  जिस पर जमा है बरसों का 'मैलापन' कहीं

जो औरों को कम आंकते—आंकते 

अब बन चुका हैं 'काई'...। 

    ख़ुद की 'सड़न' भी सुंघ लेना कभी

तभी महसूस होगी औरों की 'ख़ुशबू' कभी....। 



मत भटक फ़ितरतबाज़ी में,

चार पल की ही तो हैं ​जिंदगानी...।

जी भर जी लें, ख़ुद ही के अफसानों संग 

क्या ख़बर 'इसका—उसका' में 

ग़ुजर न जाए ये शाम मस्तानी...।

ठहर जाना ऐ, 'इंसान'

  टीना शर्मा 'माधवी'

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

'अर्थी' का बोझ ही शेष....

    सूजी हुई आंखें...कपकपाते हाथ...और छाती  में धड़क रहा बेबस कलेजा...बैठा हैं सड़क पर उन खिलौनों के बीच जो मासूम कांधे पर सवार होकर आज मेले में बिकने आए थे। लेकिन जो हाथ इन्हें बेच रहे हैं उनमें अब वो जान नहीं बची जो महज़ कुछ घंटों पहले तक थी। इन हाथों में मजबूर हालातों की उस अर्थी का बोझ ही शेष रह गया हैं जो सिर्फ सहारा बनकर मेले में आई थी...।    पड़ोस के गांव में आज मेला भरा है। कमला इस बात से बेहद खुश है। वो सोचती हैं मेले में खिलौने बेचकर कुछ पैसा कमा लेगी जो बीमार पति के इलाज और घर चलाने के काम आ जाएगा। इसीलिए वो अपने ही गांव के एक व्यापारी से करीब तीस हजार रुपए के खिलौने उधार ले आती हैं।     ये व्यापारी उसे कहता हैं कि कमला वैसे तो हर बार तू खिलौने ले जाती हैं और समय पर पैसा भी चुका देती हैं। इस बार तूने ज़्यादा उधारी की हैं, मेले से आते ही पैसा चुका देना।         कमला हंसकर कहती हैं......होओ सेठ। आज तक शिकायत का मौका नहीं दिया है.....इस बार भी नहीं दूंगी। ऐसा कहते हुए वो घर पर आती है और अपनी दोनों बेटियों के साथ मेले में जाने की तैयारी करती है।         वह अपने बीमार पति को खान

मीरा का ‘अधूरा’ प्रेम...पार्ट-2

         देव बिना रुके बोलता रहा। उसकी बातें सुनने के बाद मैंने उससे पूछा कि , तो क्या देव वो पत्र मीरा ने नहीं पढ़ा था? हैं ईश्वर...! उस रात मुझसे कितनी बड़ी भूल हो गई। मैंने मीरा की बातों पर क्यूं भरोसा नहीं किया...?   ओह! मीरा मुझे माफ कर दो। ‘वह चिल्लाती रही, प्रेम मेरा विश्वास करो...मैं इस पत्र के बारे में कुछ नहीं जानती...।      काश! उस दिन उस वक़्त मीरा की बातों पर भरोसा किया होता...। देव की बातें सुनने के बाद मैंने उसे बताया कि उस रात तुम्हारें जानें के बाद मैं,  मीरा के घर पहुंचा था। मीरा ने बताया था कि तुम उससे मिलकर कुछ ही देर पहले निकलें हो। मैंने उससे कहा कि ठीक हैं तुम एक ग्लास पानी ले आओ। वह पानी लेने गई। मैंने इधर-उधर देखा और फिर मेज़ पर रखी क़िताब को उठाया। मैंने ऐसे ही उसके पन्ने पलटना शुरु किए। तभी उसके अंदर से एक कागज़ गिरा। ये तुम्हारा पत्र था।     इसकी पहली पंक्ति में लिखा था कि प्लीज पढ़ने के बाद नाराज़ नहीं होना...। ये पढ़कर मैं खु़द को रोक नहीं पाया और पत्र को पढ़ने लगा।      पत्र की शुरुआत ‘डियर मीरा’ से हुई। यह पढ़ते ही मेरी छाती फट गई। मानों किसी ने गहरा वार किया हो.

स्वदेशी खेल...राह मुश्किल

        हाल ही में केंद्रीय खेल मंत्रालय ने 'खेलों इंडिया यूथ गेम्स—2021' में चार स्वदेशी खेलों गतका, कलारीपयट्टू, थांग—ता और मलखम्ब को शामिल किया हैं। कोरोनाकाल के बीच सुखद अहसास का अनुभव कराती हुई ये ख़बर वाकई खेल जगत और खिलाड़ियों के लिए एक सकारात्मक और दूरदर्शी फैसला हैं।      हमारी भारतीय संस्कृति हमेशा से ही समृद्ध और संपन्न रही हैं। चाहे वो हमारे वैदिक संस्कारों की बात हो या फिर खान—पान, वेशभूषा, रहन—सहन और पांरपरिक खेलों की। ये ही असल में हमारी पहचान भी हैं।      ऐसे में स्वदेशी खेलों को आगे बढ़ाने से ना​ सिर्फ 'पारंपरिक खेलोें' को अंतरराष्ट्रीय खेल मंचों पर पहचान मिलेगी बल्कि देश के गांव—कस्बों में रहने वाले हजारों लाखों युवाओं को भी आगे बढ़ने का मौका मिल सकेगा।      हमारे गांवों की प्रतिभाएं हमारी संस्कृति और पंरपरा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ सकेंगी। क्योंकि हमारे ये ही पारंपरिक खेल विभिन्न भारतीय राज्यों की सांस्कृतिक और पारंपरिक पृष्ठभूमि को भी दिखाते हैं।       यदि हम अपने पारंपरिक खेलों की बात करें तो उसमें ना सिर्फ जीवन जीने