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Showing posts from October, 2021

कबिलाई एक 'प्रेम—कथा'...भाग—7

.......लेकिन कबिलाईयों ने उसे अपने बेटे सोहन के पास नहीं जाने दिया...ये देखकर शंकरी चिल्ला उठी...बस करो....। सारे के सारे एक निहत्थे पर टूट पड़े...बूढ़ी मां ने तुम सबका क्या बिगाड़ा हैं...इस पर तो तरस खाओ...। शंकरी की बात सुनकर भीखू सरदार का भाई उसके बाल पकड़कर उसे घसीटता हुआ सोहन के पास लाया और उसी के सामने सोहन को लात—घुसों से मारने लगा...। शंकरी ने पूरी ताकत से उसे धक्का मारा और सोहन को बचाने के लिए उसके आगे आ गई। उसने सोहन को कसकर पकड़ लिया। पूरे नौ बरस बाद दोनों एक—दूसरे के इतने क़रीब थे।     सोहन ने नौ बरस पहले शंकरी को ऐसे ही गले से लगाया था...उसका वो स्पर्श आज फिर से जीवंत हो उठा ...। उसने भी शंकरी को अपनी बाहों में भर लिया...। दोनों के दिल जोरों से धड़कनें लगे...दोनों एक—दूजे के लिए तड़प उठे...।            ये देख भीखू सरदार बोला— अरे! इसे सोहन से दूर करो...। आज कबिले का हर आदमी अपनी आंखों से देखेगा...बस्ती के रीति—रिवाज़ों को तोड़ने का अंजाम क्या होता हैं...। शंकरी को भी इसके किये की सज़ा अवश्य ही मिलेगी...लेकिन उससे पहले इस शहरी बाबू को हमारे मान—सम्मान को ठेस पहुंचाने की सज़

कबिलाई एक 'प्रेम—कथा'...भाग— 6

कबिलाई एक जीप को घेरेे खड़े हैं...और हवा में खंजर...चाकू...दांती..कुदाली लहरा रहे हैं...। भीखू सरदार और उसका भाई नौ बरस से जिस दिन के इंतज़ार में थे वो इस वक़्त उनकी आंखों के सामने था...।  जिस सोहन को वे हर जगह ढूंढ रहे थे, वो आज उनके सामने खड़ा था...। दोनों के लिए इस पर यक़ीन कर पाना मुश्किल था लेकिन ये सच था...। दोनों ने एक—दूसरे की ओर देखा और तेजी से भीड़ की ओर बढ़े। जीप के पास सोहन हाथ जोड़े हुए खड़ा था और उसके माथे से पसीना टपक रहा था। जीप के भीतर उसकी बूढ़ी मां बैठी हुई थी...जो बुरी तरह से कांप रही थी...।  तभी भीखू सरदार चिल्ला उठा...क्या हो रहा हैं ये सब...। अपने सरदार को देख सभी कबिलाई खुशी से झूम उठे और चारों तरफ 'हो हुक्का...हो हुक्का...हो हुक्का'...का शोर गूंज उठा।  सरदार ने हाथ हिलाते हुए सभी को शांत होने को कहा...। तभी पास ही खड़ा भीखू सरदार का भाई मूंछों पर ताव देते हुए बोला...'ओ..हो...सोहन बाबू...! बरसो बाद...मिलें हो...कहो— कैसे हो'...।  तभी कबिलाई बोल उठे, अरे! ये क्या बताएगा अब...। अब तो हम बताएंगे इसे...। तभी सरदार फिर चिल्ला उठा...शांत हो जाओ सभी...इ

कबिलाई एक 'प्रेम—कथा'... भाग—5

      आज बरसों बाद मौसम ने घना काला चौला ओढ़े हुए अपनी बाहों में बारिश को भर लिया था जैसे....हर गर्ज़ना पर उसकी आह सुनाई दे रही मानो...। शंकरी ने तंबू से बाहर झांककर देखा तो शाह अंधेरा मंडराया हुआ था...और तभी बादल फट पड़े और तेज बारिश होने लगी।   शंकरी कांप उठी और भीतर आकर अपने बिछौने में सिमटकर बैठ गई। उसका दिल जोरों से धड़कनें लगा...आंखों में बीती यादें तैर उठी...बारिश की धार ने उसके दिल को छलनी कर दिया...वह समझ गई...इस बारिश का वेग भी उतना ही तीव्र है जितना कि उस रात में था।        एक बार फिर शंकरी के ख़याल में वो रात जाग उठी...उस तूफानी रात के आग़ोश में सोहन की यादें करवटें लेने लगी।  और उसे ये महसूस होने लगा मानों सोहन यहीं कहीं हैं...उसके आसपास...।  मगर अपने अहसासों को किससे बांटे... अपनी तड़प को किससे बयां करें...। यहां कौन हैं जो उसके भीतर की आग को महसूस कर सके...। ये बारिश की बूंदें ही हैं जो उसकी तपन को कुछ ठंडक दे रही हैं...वह कभी अपने तंबू से बाहर जाती और ख़ुद को इन बूंदों से भीगो आती...और फिर उन्हीं बूंदों को अपने आंचल से पोंछ लेती। लेकिन बूंदों के होने का अहसास उसके चेहरे