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Showing posts from November, 2021

रानी लक्ष्मीबाई जयंती----

'खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी बुंदेलों हर बोलो के  मुंह हमने सुनी कहानी थी...।       याद होगी आपको ये पंक्तियां...। जिसे कवयित्री 'सुभद्रा कुमारी चौहान' ने लिखा था। जिस वक़्त जिस दिन और जिस प्रहर में ये पंक्तियां लिखी जा रही होगी तब किसने सोचा था कि ये पंक्तियां आज़ादी के इतने सालों बाद भी यूं नसों में दौड़ेगी और खून में उबाल लाएगी...। लेकिन ये सच ही हैं जब भी इन पंक्तियों को पढ़ा या सुना जाता हैं तब उस बहादुर लड़की की तस्वीरें सामने आने लगती हैं जिसने अपने देश की ख़ातिर ख़ुद को मिटा दिया लेकिन देश का सिर झुकने  नहीं  दिया।        ये पंक्तियां उस पूरी कहानी को शुरुआत से अंत तक बयां करती  हैं  जब हम ख़ुद को उसी समय में पाते हैं.....ऐसा लगता हैं मानों हम उसी क्रांति में शामिल हैं जब एक हाथ में तलवार थामें  हुए  और दूसरे हाथ से अपनी पीठ पर अपने बेटे को संभाले हुए ये बहादुर वीरांगना अपने देश के  दुश्मनों से युद्ध लड़ रही हो।        ज़रा ठहर कर सोचिए...क्या  वाकई   ये इतना आसान  रहा होगा . ..? जिसे सोचने भर से हम कांप जाते हैं उसे झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने कर दिखा

यूं तेरा 'लौटना'...

 यूं  तेरा 'लौटना' बेशक एक नई शुरुआत है जिसमें ख़ुद से ख़ुद की मुलाकात है। तेरा 'लौटना' बेशक आत्मा का एक 'सुकून' है,....।      उस भोली सुबह की पहली किरण भी है। तेरा 'लौटना' उस पहली  'छुअन'  की याद दिलाना  और साथ गुज़ारें पलों का अहसास भी है...।   निश्चत ही तेरा 'लौटना' मेरा 'वजूद' भी है और मेरे होने का 'सबूत' भी...।  मगर....! मगर....! सिद्धी शर्मा  तेरा लौटना उस 'अंत' के बाद की शुरूआत है, जो न 'लौटने' के लिए हुआ था कभी....।  तेरा लौटना उस 'अंत' के बाद की शुरूआत है, जो न 'लौटने' के लिए हुआ था कभी....।  दिल तेरे यूं लौट आने पर कैसे खोले वो दरवाज़े   जिसे ख़ुद तूने ही बंद किए थे कभी....। बेशक तेरा यूं 'लौट आना' एक नई शुरुआत है एक नई शुरुआत हैं...'मगर'...!  अब न वो 'हालात' हैं और न वो 'बात' है...।   बेशक तेरा यूं 'लौट आना' एक नई शुरुआत है ...... टीना शर्मा 'माधवी'

'पारंपरिक खेल' क्यों नहीं...?

'बाल दिवस' पर विशेष——— ये कहानी हैं एक ऐसे बचपन की जिसमें धूल और मिट्टी से सने हाथ और पैर हैं...। ये कहानी हैं एक ऐसे अल्हड़पन की जो बेफिक्र था 'कॉम्पीटीशन' की चकाचौंध वाले गैजेट्स से...। ये कहानी हैं एक ऐसे बचपन की जहां दोस्ती की छांव में ऊँच-नीच का भेद न था...ये कहानी है एक ऐसे बचपन की जब पीट पर थप्पी मारते ही दौड़ शुरु हो जाया करती थी...ये कहानी हैं एक ऐसे बचपनें की जहां 'खेल' सिर्फ खेलने भर के लिए ही खेले जाते थे, जिसमें अपनापन भी था और ज़मीन से जुड़ाव भी।  सिद्धी शर्मा  कहां गुम हो गए हैं वो कंचें और चीयों की खन—खन...वो पत्थर का गोल सितोलिया...और वो लंगड़ी पव्वा...।    वो कपड़ें की गेंद का पीट पर मारना तो हाथ पकड़कर वो फूंदी लेना...। वो 'ता' बोलकर कहीं छुप जाना, फिर पीछे से आकर 'होओ' कहकर डरा देना...।      कहीं बहुत पीछे छूट गया हैं 'शायद' वो बचपन....और छूट गई है वो 'चिल्ला पौ'...। कहीं पीछे छूट गए हैं वो परंपरा से बंधें खेल...जो आज के 'बचपनें' से कोसो दूर हो चले हैं...। मलाल है इस बात पर कि, वर्तमान पीढ़ी में ये खेल

कबिलाई एक 'प्रेम—कथा'...भाग—8

...'मेरे बेटे की जान तो ले ली तुमने अब इसकी लाश पर से मेरा हक मत छीनो...। इसे लेकर मुझे जाने दो'...। सरदार ने फोरन अपने भाई को सोहन की गाड़ी की ओर दौड़ने और उसमें पड़े सच को खोज लाने को कहा...।    भीखू सरदार का भाई बिना देरी किए गाड़ी की ओर दौड़ पड़ा...। उसने गाड़ी में तलाश शुरु की तब उसे एक 'डायरी' मिली, जिसके पहले पृष्ठ पर लिखा था 'शंकरी'...।    ये पढ़कर सरदार का भाई कुछ चौंका फिर बिना रुके हुए वो डायरी लेकर सीधे भीखू सरदार के पास पहुंचा और उसके हाथ में डायरी देते हुए बोला, शायद सोहन की 'मां' इसी सच के बारे में बोल रही हैं...।      सरदार ने डायरी खोली और पहला पृष्ठ देख वो भी चौंका जिस पर 'शंकरी' लिखा था। उसने सोहन की मां से पूछा क्या ये है सच...? मां ने गर्दन हिलाई और फुट—फुटकर रोने लगी...।      सरदार ने अपने भाई को डायरी दी और उसे पढ़ने को कहा। टिबड्डे पर मौजूद सभी कबिलाई डायरी में क्या लिखा हुआ है ये जानना चाहते थे...। पूरा माहौल शांत हो गया...जो जहां था वहीं बैठ गया...।     सरदार के भाई ने डायरी पढ़ना शुरु की।  'आज भयानक तूफानी रात है...